डोडिया वंश की उत्पत्ति कदलीवृक्ष के डोडे (पुष्प)से एक साहसी वीर क्षत्रिय पुरूष दीपंग का जन्म हुआ । केले के डोडे पुष्पकली से उत्पन्न होने के कारण दीपंग का वंश डोडिया कहलाया । दीपंग का साम्राज्य विस्तार सौराष्ट्र हिंगलाज काठियिवाड एवं समुद्र तक था ।दीपंग की राजधानी मुल्तान थी ।
गुरुवार, 4 जनवरी 2018
द्वारिकाधीश मंदिर का एक बडा सा समयसूचक घंटा है जो हर एक घंटे में बजाया जाता है और ईसकी आवाज पुरे नगर में काफी दूर दूर तक सुनाई देती है, प्रभु द्वारिकाधीश मंदिर में ही एक पुस्तकालय भी है जहां बहुत ही पुरानी एवं अमुल्य पुस्तकें हैं । प्रभु द्वारिकाधीश मंदिर का अपना एक बेण्ड भी है जो विशेष दर्शनों, मनोरथों व सवारी आदि के दौरान अपनी मधुर स्वरलहरीयां बिखेरता हैं । Koteladodia.blogspot.com
हल्दीघाटी का युद्ध
हल्दीघाटी भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध राजस्थान का वह ऐतिहासिक स्थान है, जहाँ महाराणा प्रताप ने अपनी मातृभूमि की लाज बचाये रखने के लिए असंख्य युद्ध लड़े और शौर्य का प्रदर्शन किया। हल्दीघाटी राजस्थान के उदयपुर ज़िले से 27 मील (लगभग 43.2 कि.मी.) उत्तर-पश्चिम एवं नाथद्वारा से 7 मील (लगभग 11.2 कि.मी.) पश्चिम में स्थित है। यहीं सम्राट अकबर की मुग़ल सेना एवं महाराणा प्रताप तथा उनकी राजपूत सेना में 18 जून, 1576 को भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में प्रताप के साथ कई राजपूत योद्धाओं सहित हकीम ख़ाँ सूर भी उपस्थित था। इस युद्ध में राणा प्रताप का साथ स्थानीय भीलों ने दिया, जो इस युद्ध की मुख्य बात थी। मुग़लों की ओर से राजा मानसिंह सेना का नेतृत्व कर रहे थे। इतिहास
हल्दीघाटी का युद्धतिथि18/21 जून 1576स्थानहल्दीघाटी
24°53′32″N 73°41′52″E / 24.8921711°N 73.6978065°Eपरिणामअनर्णयकयोद्धामेवाड़ सेनानायकमहाराणा प्रताप
हकीम खाँ सूरी †
राणा पूंजा
डोडिया भीम
मान सिंह झाला †
मान सिंह बीड़ा
राजा रामशाह सिंह तोमर †
शालीवाहन सिंह तोमर †
कृष्णादास चुण्डावत
चंद्रसेन राठौर
आचार्य राघवेन्द्र[
मान सिंह I
स्येद हासिम
स्येद अहमद खान
बहलोल खान †
मुल्तान खान †
काजी खान †
भोकाल सिंह †
खोरासन †
उदयपुर से नाथद्वारा जाने वाली सड़क से कुछ दूर हटकर पहाडि़यों के बीच स्थित हल्दीघाटी इतिहास प्रसिद्ध वह स्थान है, जहां 1576 ई. में महाराणा प्रताप और मुग़ल बादशाह अकबर की सेनाओं के बीच घोर युद्ध हुआ था। इस स्थान को 'गोगंदा' भी कहा जाता है। अकबर के समय के राजपूत नरेशों में मेवाड़ के महाराणा प्रताप ही ऐसे थे, जिन्हें मुग़ल बादशाह की मैत्रीपूर्ण दासता पसन्द न थी। इसी बात पर उनकी आमेर के मानसिंह से भी अनबन हो गई थी, जिसके फलस्वरूप मानसिंह के भड़काने से अकबर ने स्वयं मानसिंह और सलीम (जहाँगीर) की अध्यक्षता में मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भारी सेना भेजी।
हल्दीघाटी की लड़ाई 18 जून, 1576 ई. को हुई थी। इसमें राणा प्रताप ने अप्रतिम वीरता दिखाई। उनका परम भक्त सरदार झाला मान इसी युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ था। स्वयं प्रताप के दुर्घर्ष भाले से गजासीन सलीम बाल-बाल बच गया। किन्तु प्रताप की छोटी सेना मुग़लों की विशाल सेना के सामने अधिक सफल नहीं हो सकी और प्रताप अपने घायल, किन्तु बहादुर घोड़े पर युद्ध-क्षेत्र से बाहर आ गये, जहां चेतक ने प्राण छोड़ दिये। इस स्थान पर इस स्वामिभक्त घोड़े की समाधि आज भी देखी जा सकती है। इस युद्ध में प्रताप की 22 सहस्त्र सेना में से 14 सहस्त्र काम आई थी। इसमें से 500 वीर सैनिक राणा प्रताप के सम्बंधी थे। मुग़ल सेना की भारी क्षति हुई तथा उसके भी लगभग 500 सरदार मारे गये थे। सलीम के साथ जो सेना आयी थी, उसके अलावा एक सेना वक्त पर सहायता के लिये सुरक्षित रखी गई थी। और इस सेना द्वारा मुख्य सेना की हानिपूर्ति बराबर होती रही। इसी कारण मुग़लों के हताहतों की ठीक-ठीक संख्या इतिहासकारों ने नहीं लिखी है। इस युद्ध के पश्चात् राणा प्रताप को बड़ी कठिनाई का समय व्यतीत करना पड़ा था। किन्तु उन्होंने कभी साहस नहीं छोड़ा और अपने राज्य का अधिकांश मुग़लों से वापस छीन लिया था।
बलिदान भूमि
हल्दीघाटी राजपूताने की वह पावन बलिदान भूमि है, जिसके शौर्य एवं तेज़ की भव्य गाथा से इतिहास के पृष्ठ रंगे हैं। भीलों का अपने देश और नरेश के लिये वह अमर बलिदान, राजपूत वीरों की वह तेजस्विता और महाराणा का वह लोकोत्तर पराक्रम इतिहास में प्रसिद्ध है। यह सभी तथ्य वीरकाव्य के परम उपजीव्य है। मेवाड़ के उष्ण रक्त ने श्रावण संवत 1633 वि. में हल्दीघाटी का कण-कण लाल कर दिया। अपार शत्रु सेना के सम्मुख थोड़े-से राजपूत और भील सैनिक कब तक टिकते? महाराणा को पीछे हटना पड़ा और उनका प्रिय अश्व चेतक, उसने उन्हें निरापद पहुँचाने में इतना श्रम किया कि अन्त में वह सदा के लिये अपने स्वामी के चरणों में गिर पड़ा।
युद्ध की तैयारी दिल्ली का उत्तराधिकारी शहज़ादा सलीम (बाद में बादशाह जहाँगीर) मुग़ल सेना के साथ युद्ध के लिए चढ़ आया। उसके साथ राजा मानसिंह और सागरजी का जातिभ्रष्ट पुत्र मोहबत ख़ाँ भी था। प्रताप ने अपने पर्वतों और बाईस हज़ार राजपूतों में विश्वास रखते हुए अकबर के पुत्र का सामना किया। अरावली के पश्चिम छोर तक शाही सेना को किसी प्रकार के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा, परन्तु इसके आगे का मार्ग प्रताप के नियन्त्रण में था। प्रताप अपनी नई राजधानी के पश्चिम की ओर पहाड़ियों में आ डटे। इस इलाक़े की लम्बाई लगभग 80 मील (लगभग 128 कि.मी.) थी और इतनी ही चौड़ाई थी। सारा इलाक़ा पर्वतों और वनों से घिरा हुआ था। बीच-बीच में कई छोटी-छोटी नदियाँ बहती थीं। राजधानी की तरफ़ जाने वाले मार्ग इतने तंग और दुर्गम थे कि बड़ी कठिनाई से दो गाड़ियाँ आ-जा सकती थीं। इस स्थान का नाम हल्दीघाटी है, इसके द्वार पर खड़े पर्वत को लाँघकर उसमें प्रवेश करना संकट को मोल लेने के समान था। प्रताप के साथ विश्वासी भील लोग भी धनुष और बाण लेकर डट गए। भीलों के पास बड़े-बड़े पत्थरों के ढेर पड़े थे, जैसे ही शत्रु सामने से आयेगा वैसे ही पत्थरों को लुढ़काकर उनके सिर को तोड़ने की योजना बनाई गई थी।
हल्दीघाटी का युद्ध
महाराणा उदयसिंह 1541 ई. में राणा बने थे और राणा बनने के कुछ ही समय बाद अकबर की मुग़ल सेना ने मेवाड़ पर आक्रमण कर चित्तौड़ को घेर लिया। किंतु राणा उदयसिंह ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और प्राचीन आधाटपुर के पास उदयपुर नामक अपनी राजधानी बसाकर वहाँ चले गये। उनके बाद महाराणा प्रताप ने भी युद्ध जारी रखा और अधीनता स्वीकार नहीं की। 'हल्दीघाटी का युद्ध' 'भारतीय इतिहास' में प्रसिद्ध है। राजपूत और मुग़ल सैनिकों के मध्य 'हल्दीघाटी का युद्ध' जून, 1576 ई. में लड़ा गया। बादशाह अकबर ने मेवाड़ को पूर्णरूप से जीतने के लिए राजा मानसिंह एवं आसफ़ ख़ाँ के नेतृत्व में मुग़ल सेना को आक्रमण के लिए भेजा। दोनों सेनाओं के मध्य 'गोगुंडा' के निकट अरावली पहाड़ी की हल्दीघाटी शाखा के मध्य युद्ध हुआ।
दोनों ओर की सेनाओं का सामना होते ही भीषण रूप से युद्ध शुरू हो गया और दोनों तरफ़ के शूरवीर योद्धा घायल होकर ज़मीन पर गिरने लगे। प्रताप अपने घोड़े चेतक पर सवार होकर द्रुतगति से शत्रु की सेना के भीतर पहुँच गये और राजपूतों के शत्रु मानसिंह को खोजने लगे। वह तो नहीं मिला, परन्तु प्रताप उस जगह पर पहुँच गये, जहाँ पर सलीम अपने हाथी पर बैठा हुआ था। प्रताप की तलवार से सलीम के कई अंगरक्षक मारे गए और यदि प्रताप के भाले और सलीम के बीच में लोहे की मोटी चादर वाला हौदा नहीं होता तो अकबर अपने उत्तराधिकारी से हाथ धो बैठता। राणा प्रताप के घोड़े चेतक ने अपने स्वामी की इच्छा को भाँपकर पूरा प्रयास किया और तमाम ऐतिहासिक चित्रों में सलीम के हाथी के सूँड़ पर चेतक का एक उठा हुआ पैर और प्रताप के भाले द्वारा महावत का छाती का छलनी होना अंकित किया गया है।[2]
मन्नाजी का बलिदान महावत के मारे जाने पर घायल हाथी सलीम सहित युद्ध भूमि से भागने लगा था, लेकिन सलीम ने उसे नियंत्रित कर लिया। युद्ध उस समय और भी भयानक हो उठा, जब शहज़ादा सलीम पर राणा प्रताप के आक्रमण को देखकर असंख्य मुग़ल सैनिक उसी तरफ़ बढ़े और प्रताप को घेरकर चारों तरफ़ से उन पर प्रहार करने लगे। राणा प्रताप के सिर पर मेवाड़ का मुकुट था जिससे सारे मुग़ल प्रताप को पहचान पा रहे थे।
इसलिए मुग़ल सैनिक उसी को निश बनाकर वार कर रहे थे। राजपूत सैनिक भी राणा को बचाने के लिए प्राण हथेली पर रखकर संघर्ष कर रहे थे। परन्तु धीरे-धीरे प्रताप संकट में फँसता जा रहा था। स्थिति की गम्भीरता को परखकर झाला सरदार 'मन्नाजी' (या 'झाला मान') ने स्वामिभक्ति का एक अपूर्व आदर्श प्रस्तुत करते हुए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। झाला सरदार मन्नाजी तेज़ी के आगे बढ़ा और प्रताप के सिर से मुकुट उतार कर अपने सिर पर रख लिया और तेज़ी के साथ कुछ दूरी पर जाकर घमासान युद्ध करने लगा। मुग़ल सैनिक उसे ही प्रताप समझकर उस पर टूट पड़े और प्रताप को युद्ध भूमि से दूर निकल जाने का अवसर मिल गया। उसका सारा शरीर अगणित घावों से लहूलुहान हो चुका था। युद्धभूमि से जाते-जाते प्रताप ने मन्नाजी को मरते देखा। राजपूतों ने बहादुरी के साथ मुग़लों का मुक़ाबला किया, परन्तु मैदानी तोपों तथा बन्दूकधारियों से सुसज्जित शत्रु की विशाल सेना के सामने समूचा पराक्रम निष्फल रहा। युद्धभूमि पर उपस्थित बाईस हज़ार राजपूत सैनिकों में से केवल आठ हज़ार जिवित सैनिक युद्धभूमि से किसी प्रकार बचकर निकल पाये।
युद्ध की समाप्ति
'हल्दीघाटी का युद्ध' युद्ध राणा प्रताप के पक्ष में निर्णायक न हो सका। खुला युद्ध समाप्त हो गया था, किंतु संघर्ष समाप्त नहीं हुआ था। भविष्य में संघर्षो को अंजाम देने के लिए राणा प्रताप एवं उनकी सेना युद्ध स्थल से हटकर पहाड़ी प्रदेश में आ गयी थी। बाद के कुछ वर्षों में जब अकबर का ध्यान दूसरे कामों में लगा गया, तब प्रताप ने अपने स्थानों पर फिर अधिकार कर लिया था। सन् 1597 में चावंड में उनकी मृत्यु हो गई थी। अकबर की अधीनता स्वीकार न किए जाने के कारण प्रताप के साहस एवं शौर्य की गाथाएँ तब तक गुंजित रहेंगी, जब तक युद्धों का वर्णन किया जाता रहेगा। युद्ध के दौरान प्रताप का स्वामिभक्त घोड़ा चेतक घायल हो गया था, फिर भी वह बुरी तरह घायल हो चुके अपने स्वामी को युद्ध स्थल से दूर निकाल ले जाने में सफल रहा। उसने अपने स्वामी की शत्रुओं के हाथ में पड़ जाने से रक्षा की और अंत मेवीरगति को प्राप्त हुआ। युद्ध स्थली के समीप ही चेतक की स्मृति में स्मारक बना हुआ है। अब यहाँ पर एक संग्रहालय है। इस संग्रहालय में हल्दीघाटी के युद्ध के मैदान का एक मॉडल रखा गया है। इसके अलावा यहाँ महाराणा प्रताप से संबंधित वस्तुओं को भी सहेज कर रखा गया है।
महाराणा प्रताप का छोटा भाई शक्ति सिंह मुग़ल सेना में था प्रताप को घायल हुआ देखकर दो मुग़ल सेनिक प्रताप का पीछा करने लगे तो शक्ति सिंह का भाई प्रेम जाग गया ओर मुग़ल सेनिको को मार दिया और अपने भाई की रक्षा की और उस जगह पर चेतक ने प्राण त्याग दिए जहाँ आज भी चेतक का स्मारक बना हुआ है ।
Jashwan Sinh Doda tikana-kotel
हल्दीघाटी भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध राजस्थान का वह ऐतिहासिक स्थान है, जहाँ महाराणा प्रताप ने अपनी मातृभूमि की लाज बचाये रखने के लिए असंख्य युद्ध लड़े और शौर्य का प्रदर्शन किया। हल्दीघाटी राजस्थान के उदयपुर ज़िले से 27 मील (लगभग 43.2 कि.मी.) उत्तर-पश्चिम एवं नाथद्वारा से 7 मील (लगभग 11.2 कि.मी.) पश्चिम में स्थित है। यहीं सम्राट अकबर की मुग़ल सेना एवं महाराणा प्रताप तथा उनकी राजपूत सेना में 18 जून, 1576 को भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में प्रताप के साथ कई राजपूत योद्धाओं सहित हकीम ख़ाँ सूर भी उपस्थित था। इस युद्ध में राणा प्रताप का साथ स्थानीय भीलों ने दिया, जो इस युद्ध की मुख्य बात थी। मुग़लों की ओर से राजा मानसिंह सेना का नेतृत्व कर रहे थे। इतिहास
हल्दीघाटी का युद्धतिथि18/21 जून 1576स्थानहल्दीघाटी
24°53′32″N 73°41′52″E / 24.8921711°N 73.6978065°Eपरिणामअनर्णयकयोद्धामेवाड़ सेनानायकमहाराणा प्रताप
हकीम खाँ सूरी †
राणा पूंजा
डोडिया भीम
मान सिंह झाला †
मान सिंह बीड़ा
राजा रामशाह सिंह तोमर †
शालीवाहन सिंह तोमर †
कृष्णादास चुण्डावत
चंद्रसेन राठौर
आचार्य राघवेन्द्र[
मान सिंह I
स्येद हासिम
स्येद अहमद खान
बहलोल खान †
मुल्तान खान †
काजी खान †
भोकाल सिंह †
खोरासन †
उदयपुर से नाथद्वारा जाने वाली सड़क से कुछ दूर हटकर पहाडि़यों के बीच स्थित हल्दीघाटी इतिहास प्रसिद्ध वह स्थान है, जहां 1576 ई. में महाराणा प्रताप और मुग़ल बादशाह अकबर की सेनाओं के बीच घोर युद्ध हुआ था। इस स्थान को 'गोगंदा' भी कहा जाता है। अकबर के समय के राजपूत नरेशों में मेवाड़ के महाराणा प्रताप ही ऐसे थे, जिन्हें मुग़ल बादशाह की मैत्रीपूर्ण दासता पसन्द न थी। इसी बात पर उनकी आमेर के मानसिंह से भी अनबन हो गई थी, जिसके फलस्वरूप मानसिंह के भड़काने से अकबर ने स्वयं मानसिंह और सलीम (जहाँगीर) की अध्यक्षता में मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भारी सेना भेजी।
हल्दीघाटी की लड़ाई 18 जून, 1576 ई. को हुई थी। इसमें राणा प्रताप ने अप्रतिम वीरता दिखाई। उनका परम भक्त सरदार झाला मान इसी युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ था। स्वयं प्रताप के दुर्घर्ष भाले से गजासीन सलीम बाल-बाल बच गया। किन्तु प्रताप की छोटी सेना मुग़लों की विशाल सेना के सामने अधिक सफल नहीं हो सकी और प्रताप अपने घायल, किन्तु बहादुर घोड़े पर युद्ध-क्षेत्र से बाहर आ गये, जहां चेतक ने प्राण छोड़ दिये। इस स्थान पर इस स्वामिभक्त घोड़े की समाधि आज भी देखी जा सकती है। इस युद्ध में प्रताप की 22 सहस्त्र सेना में से 14 सहस्त्र काम आई थी। इसमें से 500 वीर सैनिक राणा प्रताप के सम्बंधी थे। मुग़ल सेना की भारी क्षति हुई तथा उसके भी लगभग 500 सरदार मारे गये थे। सलीम के साथ जो सेना आयी थी, उसके अलावा एक सेना वक्त पर सहायता के लिये सुरक्षित रखी गई थी। और इस सेना द्वारा मुख्य सेना की हानिपूर्ति बराबर होती रही। इसी कारण मुग़लों के हताहतों की ठीक-ठीक संख्या इतिहासकारों ने नहीं लिखी है। इस युद्ध के पश्चात् राणा प्रताप को बड़ी कठिनाई का समय व्यतीत करना पड़ा था। किन्तु उन्होंने कभी साहस नहीं छोड़ा और अपने राज्य का अधिकांश मुग़लों से वापस छीन लिया था।
बलिदान भूमि
हल्दीघाटी राजपूताने की वह पावन बलिदान भूमि है, जिसके शौर्य एवं तेज़ की भव्य गाथा से इतिहास के पृष्ठ रंगे हैं। भीलों का अपने देश और नरेश के लिये वह अमर बलिदान, राजपूत वीरों की वह तेजस्विता और महाराणा का वह लोकोत्तर पराक्रम इतिहास में प्रसिद्ध है। यह सभी तथ्य वीरकाव्य के परम उपजीव्य है। मेवाड़ के उष्ण रक्त ने श्रावण संवत 1633 वि. में हल्दीघाटी का कण-कण लाल कर दिया। अपार शत्रु सेना के सम्मुख थोड़े-से राजपूत और भील सैनिक कब तक टिकते? महाराणा को पीछे हटना पड़ा और उनका प्रिय अश्व चेतक, उसने उन्हें निरापद पहुँचाने में इतना श्रम किया कि अन्त में वह सदा के लिये अपने स्वामी के चरणों में गिर पड़ा।
युद्ध की तैयारी दिल्ली का उत्तराधिकारी शहज़ादा सलीम (बाद में बादशाह जहाँगीर) मुग़ल सेना के साथ युद्ध के लिए चढ़ आया। उसके साथ राजा मानसिंह और सागरजी का जातिभ्रष्ट पुत्र मोहबत ख़ाँ भी था। प्रताप ने अपने पर्वतों और बाईस हज़ार राजपूतों में विश्वास रखते हुए अकबर के पुत्र का सामना किया। अरावली के पश्चिम छोर तक शाही सेना को किसी प्रकार के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा, परन्तु इसके आगे का मार्ग प्रताप के नियन्त्रण में था। प्रताप अपनी नई राजधानी के पश्चिम की ओर पहाड़ियों में आ डटे। इस इलाक़े की लम्बाई लगभग 80 मील (लगभग 128 कि.मी.) थी और इतनी ही चौड़ाई थी। सारा इलाक़ा पर्वतों और वनों से घिरा हुआ था। बीच-बीच में कई छोटी-छोटी नदियाँ बहती थीं। राजधानी की तरफ़ जाने वाले मार्ग इतने तंग और दुर्गम थे कि बड़ी कठिनाई से दो गाड़ियाँ आ-जा सकती थीं। इस स्थान का नाम हल्दीघाटी है, इसके द्वार पर खड़े पर्वत को लाँघकर उसमें प्रवेश करना संकट को मोल लेने के समान था। प्रताप के साथ विश्वासी भील लोग भी धनुष और बाण लेकर डट गए। भीलों के पास बड़े-बड़े पत्थरों के ढेर पड़े थे, जैसे ही शत्रु सामने से आयेगा वैसे ही पत्थरों को लुढ़काकर उनके सिर को तोड़ने की योजना बनाई गई थी।
हल्दीघाटी का युद्ध
महाराणा उदयसिंह 1541 ई. में राणा बने थे और राणा बनने के कुछ ही समय बाद अकबर की मुग़ल सेना ने मेवाड़ पर आक्रमण कर चित्तौड़ को घेर लिया। किंतु राणा उदयसिंह ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और प्राचीन आधाटपुर के पास उदयपुर नामक अपनी राजधानी बसाकर वहाँ चले गये। उनके बाद महाराणा प्रताप ने भी युद्ध जारी रखा और अधीनता स्वीकार नहीं की। 'हल्दीघाटी का युद्ध' 'भारतीय इतिहास' में प्रसिद्ध है। राजपूत और मुग़ल सैनिकों के मध्य 'हल्दीघाटी का युद्ध' जून, 1576 ई. में लड़ा गया। बादशाह अकबर ने मेवाड़ को पूर्णरूप से जीतने के लिए राजा मानसिंह एवं आसफ़ ख़ाँ के नेतृत्व में मुग़ल सेना को आक्रमण के लिए भेजा। दोनों सेनाओं के मध्य 'गोगुंडा' के निकट अरावली पहाड़ी की हल्दीघाटी शाखा के मध्य युद्ध हुआ।
दोनों ओर की सेनाओं का सामना होते ही भीषण रूप से युद्ध शुरू हो गया और दोनों तरफ़ के शूरवीर योद्धा घायल होकर ज़मीन पर गिरने लगे। प्रताप अपने घोड़े चेतक पर सवार होकर द्रुतगति से शत्रु की सेना के भीतर पहुँच गये और राजपूतों के शत्रु मानसिंह को खोजने लगे। वह तो नहीं मिला, परन्तु प्रताप उस जगह पर पहुँच गये, जहाँ पर सलीम अपने हाथी पर बैठा हुआ था। प्रताप की तलवार से सलीम के कई अंगरक्षक मारे गए और यदि प्रताप के भाले और सलीम के बीच में लोहे की मोटी चादर वाला हौदा नहीं होता तो अकबर अपने उत्तराधिकारी से हाथ धो बैठता। राणा प्रताप के घोड़े चेतक ने अपने स्वामी की इच्छा को भाँपकर पूरा प्रयास किया और तमाम ऐतिहासिक चित्रों में सलीम के हाथी के सूँड़ पर चेतक का एक उठा हुआ पैर और प्रताप के भाले द्वारा महावत का छाती का छलनी होना अंकित किया गया है।[2]
मन्नाजी का बलिदान महावत के मारे जाने पर घायल हाथी सलीम सहित युद्ध भूमि से भागने लगा था, लेकिन सलीम ने उसे नियंत्रित कर लिया। युद्ध उस समय और भी भयानक हो उठा, जब शहज़ादा सलीम पर राणा प्रताप के आक्रमण को देखकर असंख्य मुग़ल सैनिक उसी तरफ़ बढ़े और प्रताप को घेरकर चारों तरफ़ से उन पर प्रहार करने लगे। राणा प्रताप के सिर पर मेवाड़ का मुकुट था जिससे सारे मुग़ल प्रताप को पहचान पा रहे थे।
इसलिए मुग़ल सैनिक उसी को निश बनाकर वार कर रहे थे। राजपूत सैनिक भी राणा को बचाने के लिए प्राण हथेली पर रखकर संघर्ष कर रहे थे। परन्तु धीरे-धीरे प्रताप संकट में फँसता जा रहा था। स्थिति की गम्भीरता को परखकर झाला सरदार 'मन्नाजी' (या 'झाला मान') ने स्वामिभक्ति का एक अपूर्व आदर्श प्रस्तुत करते हुए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। झाला सरदार मन्नाजी तेज़ी के आगे बढ़ा और प्रताप के सिर से मुकुट उतार कर अपने सिर पर रख लिया और तेज़ी के साथ कुछ दूरी पर जाकर घमासान युद्ध करने लगा। मुग़ल सैनिक उसे ही प्रताप समझकर उस पर टूट पड़े और प्रताप को युद्ध भूमि से दूर निकल जाने का अवसर मिल गया। उसका सारा शरीर अगणित घावों से लहूलुहान हो चुका था। युद्धभूमि से जाते-जाते प्रताप ने मन्नाजी को मरते देखा। राजपूतों ने बहादुरी के साथ मुग़लों का मुक़ाबला किया, परन्तु मैदानी तोपों तथा बन्दूकधारियों से सुसज्जित शत्रु की विशाल सेना के सामने समूचा पराक्रम निष्फल रहा। युद्धभूमि पर उपस्थित बाईस हज़ार राजपूत सैनिकों में से केवल आठ हज़ार जिवित सैनिक युद्धभूमि से किसी प्रकार बचकर निकल पाये।
युद्ध की समाप्ति
'हल्दीघाटी का युद्ध' युद्ध राणा प्रताप के पक्ष में निर्णायक न हो सका। खुला युद्ध समाप्त हो गया था, किंतु संघर्ष समाप्त नहीं हुआ था। भविष्य में संघर्षो को अंजाम देने के लिए राणा प्रताप एवं उनकी सेना युद्ध स्थल से हटकर पहाड़ी प्रदेश में आ गयी थी। बाद के कुछ वर्षों में जब अकबर का ध्यान दूसरे कामों में लगा गया, तब प्रताप ने अपने स्थानों पर फिर अधिकार कर लिया था। सन् 1597 में चावंड में उनकी मृत्यु हो गई थी। अकबर की अधीनता स्वीकार न किए जाने के कारण प्रताप के साहस एवं शौर्य की गाथाएँ तब तक गुंजित रहेंगी, जब तक युद्धों का वर्णन किया जाता रहेगा। युद्ध के दौरान प्रताप का स्वामिभक्त घोड़ा चेतक घायल हो गया था, फिर भी वह बुरी तरह घायल हो चुके अपने स्वामी को युद्ध स्थल से दूर निकाल ले जाने में सफल रहा। उसने अपने स्वामी की शत्रुओं के हाथ में पड़ जाने से रक्षा की और अंत मेवीरगति को प्राप्त हुआ। युद्ध स्थली के समीप ही चेतक की स्मृति में स्मारक बना हुआ है। अब यहाँ पर एक संग्रहालय है। इस संग्रहालय में हल्दीघाटी के युद्ध के मैदान का एक मॉडल रखा गया है। इसके अलावा यहाँ महाराणा प्रताप से संबंधित वस्तुओं को भी सहेज कर रखा गया है।
महाराणा प्रताप का छोटा भाई शक्ति सिंह मुग़ल सेना में था प्रताप को घायल हुआ देखकर दो मुग़ल सेनिक प्रताप का पीछा करने लगे तो शक्ति सिंह का भाई प्रेम जाग गया ओर मुग़ल सेनिको को मार दिया और अपने भाई की रक्षा की और उस जगह पर चेतक ने प्राण त्याग दिए जहाँ आज भी चेतक का स्मारक बना हुआ है ।
Jashwan Sinh Doda tikana-kotel
बुधवार, 3 जनवरी 2018
चित्तौड़गढ़ दुर्ग भारत का सबसे विशाल दुर्ग है।यह राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में स्थित है जो भीलवाड़ा से कुछ किमी दक्षिण में है। यह एक विश्व विरासत स्थल है। चित्तौड़ मेवाड़ की राजधानी थी।[1]चित्तौड़गढ़ दुर्गचित्तौड़गढ़ दुर्गइस किले ने इतिहास के उतार-चढाव देखे हैं। यह इतिहास की सबसे खूनी लड़ाईयों का गवाह है। इसने तीन महान आख्यान और पराक्रम के कुछ सर्वाधिक वीरोचित कार्य देखे हैं जो अभी भी स्थानीय गायकों द्वारा गाए जाते हैं। चित्तौड़ के दुर्ग को २०१३ में युनेस्को विश्व विरासत स्थल घोषित किया गया।ऐतिहासिकता तथा निर्माणकाल के बारे में निश्चत तौर पर कुछ कहना थोड़ा मुश्किल है। एक किंवदन्मत के अनुसार पाण्डवों के दूसरे भाई भीम ने इसे करीब ५००० वर्ष पूर्व बनवाया था। इस संबंध में प्रचलित कहानी यह है कि एक बार भीम जब संपत्ति की खोज में निकला तो उसे रास्ते में एक योगी निर्भयनाथ व एक यति कुकड़ेश्वर से भेंट होती है। भीम ने योगी से पारस पत्थर मांगा, जिसे योगी इस शर्त पर देने को राजी हुआ कि वह इस पहाड़ी स्थान पर रातों-रात एक दुर्ग का निर्माण करवा दे। भीम ने अपने शौर्य और देवरुप भाइयों की सहायता से यह कार्य करीब-करीब समाप्त कर ही दिया था, सिर्फ दक्षिणी हिस्से का थोड़ा-सा कार्य शेष था। योगी के ऋदय में कपट ने स्थान ले लिया और उसने यति से मुर्गे की आवाज में बांग देने को कहा, जिससे भीम सवेरा समझकर निर्माण कार्य बंद कर दे और उसे पारस पत्थर नहीं देना पड़े। मुर्गे की बांग सुनते ही भीम को क्रोध आया और उसने क्रोध से अपनी एक लात जमीन पर दे मारी, जिससे वहाँ एक बड़ा सा गड्ढ़ा बन गया, जिसे लोग भी-लत तालाब के नाम से जानते है। वह स्थान जहाँ भीम के घुटने ने विश्राम किया, भीम-घोड़ी कहलाता है। जिस तालाब पर यति ने मुर्गे की बाँग की थी, वह कुकड़ेश्वर कहलाता है।इतिहासकारों के अनुसार इस किले का निर्माण मौर्यवंशीय राजा चित्रांगद ने सातवीं शताब्दी में करवाया था और इसे अपने नाम पर चित्रकूट के रूप में बसाया। मेवाड़ के प्राचीन सिक्कों पर एक तरफ चित्रकूट नाम अंकित मिलता है। बाद में यह चित्तौड़ कहा जाने लगा। सन् ७३८ राजा बाप्पा रावल ने राजपूताने पर राज्य करने वाले मौर्यवंश के अंतिम शासक मानमोरी को हराकर यह किला अपने अधिकार में कर लिया। फिर मालवा के परमार राजा मुंज ने इसे गुहिलवंशियों से छीनकर अपने राज्य में मिला लिया। इस प्रकार ९ वीं -१० वीं शताब्दी में इस पर परमारों का आधिपत्य रहा। सन् ११३३ में गुजरात के सोलंकी राजा जयसिंह (सिद्धराज) ने यशोवर्मन को हराकर परमारों से मालवा छीन लिया, जिसके कारण चित्तौड़गढ़ का दुर्ग भी सोलंकियों के अधिकार में आ गया। तदनंतर जयसिंह के उत्तराधिकारी कुमारपाल के भतीजे अजयपाल को परास्त कर मेवाड़ के राजा सामंत सिंह ने सन् ११७४ के आसपास पुनः गुहिलवंशियों का आधिपत्य स्थापित कर दिया। सन् १२१३ से १२५२ तक नागदा के पतन के बाद यहाँ जेत्रसिंह ने इसे राजधानी बनाकर शासन चलाया। सन् १३०३ में यहाँ के रावल रतनसिंह की अल्लाउद्दीन खिलजी से लड़ाई हुई। लड़ाई चितौड़ का प्रथम शाका के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस लड़ाई में अलाउद्दीन खिलजी की विजय हुई और उसने अपने पुत्र खिज्र खाँ को यह राज्य सौंप दिया। खिज्र खाँ ने वापसी पर चित्तौड़ का राजकाज कान्हादेव के भाई मालदेव को सौंप दिया।बाप्पा रावल रोड़वंशी के वंशल राजा हमीर ने पुनः मालदेव से यह किला हस्तगत किया। हमीर बड़ा पराक्रमी और दूरदर्शी था। उसने यहाँ ५० वर्षों तक बड़ी योग्यता से शासन करते हुए अपने राज्य का विस्तार किया। उसी के प्रयत्नों से चित्तौड़ का गौरव पुनः स्थापित हो सका।और रोड राज्य द्वारा स्तापित किया सन् १५३८ में चित्तौड़ पर गुजरात के बहादुरशाह ने आक्रमण कर दिया। इस युद्ध को मेवाड़ का दूसरा शाका के रूप में जाना जाता है। सन् १५६७ में मेवाड़ का तीसरा शाका हुआ, जिसमें अकबर ने चित्तौड़ पर चढ़ाई कर दी थी। ये सब मुस्लिम आक्रमण चित्तौड़गढ़ की सांस्कृतिक विनाश का मुख्य कारणों में से एक है। तीसरे शाके के बाद ही सन् १५५९ में महाराणा उदयसिंह ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ से हटाकर अरावली के मध्य पिछोला झील के पास स्थापित कर दी, जो आज उदयपुर के नाम से जाना जाता है।रणनीति के दृष्टिकोण से चित्तौड़गढ़ का राजधानी के रूप में महत्वचित्तौड़गढ़ का किला राजपूताने में हमेशा एक विशेष महत्व रखता है। इसे मेवाड़ के गुहिलवंशियों की पहली राजधानी के रूप में सम्मान प्राप्त है, जिसे उन्होंने मौर्यवंश के अंतिम शासक मानमोनी को हराकर अपने अधिकार में कर लिया था। यह दुर्ग अरावली की पहाड़ी पर उत्तर से दक्षिण की ओर लंबाई में बना है, जिसमें बीच में समतल भूमि आ जाने के कारण एक कुंड, तालाब, मंदिर, महल आदि सभी एक निश्चित निर्माण-योजना के तहत समय-समय पर बनते रहे हैं। कुछ जलाशय तो ऐसे हैं जो निरन्तर जलापूर्ति के साधन के रूप में काम आते रहे हैं। इस गढ़ के सम्बन्ध में प्रचलित एक कहावत है जो इस दुर्ग के महत्व को बताता है।गढ़ तो चित्तौड़गढ़ और सब गढ़ैयावास्तव में इस दुर्ग का निर्माण अभी भी हमें विस्मय व रोमांच से भर देता है। लेकिन रणनीतिक दृष्टिकोण से देखने पर पता चलता है कि अपने भौगोलिक कारणों से यह दुर्ग युद्ध के लिए रणथंभौर और कुभलगढ़ जैसे दुर्गों की तरह उपयुक्त नहीं था। नि:संदेह किला सुदृढ़ था। पहाड़ी के किनारे-किनारे उदग्र खड़े चट्टानों की पंक्ति थी जिसके ऊपर एक ऊँचा और सुदृढ़ प्रकार बना हुआ था। साथ ही साथ दुर्ग में प्रवेश करने के लिए लगातार सात दरवाजे कुछ अन्तराल पर बनाए गये थे। इन सब कारणों से किले में प्रवेश कर पाना तो शत्रुओं के लिए बहुत ही मुश्किल था। परन्तु यह विस्तृत मैदान के बीच एक लम्बी पहाड़ी पर बना है जो अन्य पर्वत श्रेणियों से पृथक हो गया है। अतएव शत्रुओं द्वारा उसका घेरा डालकर किले में इस्तेमाल होने वाला रसद पहुँचाना सुगमता से रोक दिया जाता था। इस दुर्ग का जब-जब घेरा डाला गया तब-तब गढ़ में भोजन-सामग्री विद्यमान रहने तक ही गढ़ सुरक्षित रहा। भोजनादि सामग्री खत्म होते ही राजपूतों को विवश होकर युद्ध के लिए किले का द्वार खोल देना पड़ता था। लेकिन प्रायः शत्रुओं की बड़ी सेना होने की स्थिति में उन्हें हार का सामना करना पड़ता था। इस प्रकार हम देखते हैं कि चित्तौड़गढ़ का राजधानी के रूप में चयन रणनीति की दृष्टि से उचित नहीं था और यही कारण था कि महाराणा उदय सिंह ने उदयपुर को अपनी राजधानी बनाई, जो चारों तरफ पर्वतों से घिरे होने के कारण ज्यादा सुरक्षित था।वर्तमान में चित्तौड़गढ़ जंक्शन से किले के ऊपर तक पक्की सड़क बनी हुई है। करीब सवा मील जाने पर गम्भीरी नदी आती है, जिसपर अलाउद्दीन खिलजी के शाहजादे खिज्र खाँ का सन् १३०३ (वि. सं. १३६०) में बनवाया हुआ पत्थर का एक सुदृढ़ पुल है। कुछ लोगों का मानना है कि यह पुल राणा लक्ष्मण सिंह के पुत्र अरिसिंह ने, जो अलाउद्दीन के साथ लड़ाई में मारा गया था, ने बनवाया था, लेकिन ज्यादातर विद्वान इससे सहमत नहीं हैं, क्योंकि इस पुल के निर्माण में कई हिन्दु और जैन मंदिरों को गिराकर उसके पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। साथ ही इसकी निर्माण शैली भी मुसलमान (सारसेनिक) है। नदी के जल प्रवाह के लिए दस मेहरावें बनी हैं, जिसमें नौ के ऊपर के सिरे नुकीले हैं। नदी के पश्चिमी तट से छठे का अग्रभाग अर्धवृत्ताकार है। पुल से थोड़ी दूर जाने पर कोट से घिरा हुआ चित्तौड़ का कस्बा आता है जिसको तलहटी (तलहट्टिका) कहते हैं। कस्बे में जिले की कचहरी है, जिस के पास से किले की चढ़ाई प्रारम्भ हो जाती है। दुर्ग के अंतिम प्रवेश तक कुल सात दरवाजे बनाये गये हैं। इसमें प्रवेश के रास्ते से लेकर अन्दर के परिसर तक कई एक इमारतें हैं, जिनका संक्षिप्त उल्लेख इस प्रकार है-पाडन पोलयह दुर्ग का प्रथम प्रवेश द्वार है। कहा जाता है कि एक बार भीषण युद्ध में खून की नदी बह निकलने से एक पाड़ा (भैंसा) बहता-बहता यहाँ तक आ गया था। इसी कारण इस द्वार को पाडन पोल कहा जाता है। जब चित्रकूट पराधीन हो गया तब यहाँ के वीरयोध्दा गाडीलोहरो ने प्रतिज्ञा ली थी जब तक चित्रकूट स्वत्रंत न हो जाये तब तक वे :-१. इस दुर्ग पर नहीं चढेगे२. घर बना कर नहीं रहेंगे३.पिने के लिए पानी का रस्सा नहीं रखेंगे ,मिटटी के बर्तन में ही खायेगे ... जेसी प्रतिज्ञाए ली थीजन्म भूमि के प्रति देशभक्ति एवं स्वामी भक्ति की मिसाल कायम की और तब से अब ये स्वत्रंता प्रेमी बेलगाडी में ही घर बना कर देश के कोने कोने में तब से अब तक गुमनाम भटक रहे है कि गथा का प्राचीन सुरक्षित स्मारक पाडन पोल के समीप ही इन गाडीलोहारो की देश के प्रति देशभक्ति और बलिदान की गोरव गाथा को बताता है। ..रावत बाघसिंह का स्मारकदुर्ग के प्रथम द्वार पाडन पोल के बाहर के चबूतरे पर ही रावत बाघसिंह का स्मारक बना हुआ है। महाराणा विक्रमादित्य के राज्यकाल में, सन् १५३५ (वि. सं. १५९१) में यहाँ की अव्यवस्था से प्रेरित हो गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। उस समय बालक होने के कारण हाड़ी रानी कर्मवती ने विक्रमादित्य व उदयसिंह को बूंदी भेजकर मेवाड़ के सरदारों को किले की रक्षा का कार्यभार सौंप दिया। प्रतापगढ़ के रावत बाघसिंह ने मेवाड़ का राज्य चिन्ह धारण कर महाराणा विक्रमादित्य का प्रतिनिधित्व किया तथा लड़ता हुआ इसी दरवाजे के पास वीरगति को प्राप्त हुआ। उसी वीर की स्मृति में यह स्मारक बनाया गया है।भैरव पोल (भैरों पोल)पाडन पोल से थोड़ा उत्तर की तरफ चलने पर दूसरा दरवाजा आता है, जिसे भैरव पोल के रूप में जाना जाता है। इसका नाम देसूरी के सोलंकी भैरोंदास के नाम पर रखा गया है, जो सन् १५३४ में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से युद्ध में मारे गये थे। मूल द्वार टूट जाने के कारण महाराणा फतहसिंह जी ने इसका पुनर्निर्माण कराया था।जयमल व कल्ला की छतरियाँभैरव पोल के पास ही दाहिनी ओर दो छतरियाँ बनी हुई है। प्रथम चार स्तम्भों वाली छत्री प्रसिद्ध राठौड़ जैमल( जयमल बदनोर के राजा) के कुटुंबी कल्ला की है तथा दूसरी, छः स्तम्भों वाली छत्री स्वयं जैमल की है, जिसके पास ही दोनों राठौड़ मारे गये थे। सन् १५६७ (वि. सं. १६२४) में जब बादशाह अकबर ने चित्तौड़गढ़ पर चढ़ाई की, उस समय सीसोदिया पता तथा मेड़तिया राठौर जैमल, दोनों महाराणा, उदयसिंह की अनुपस्थिति में दूर्ग के रक्षक नियुक्त हुए थे। इसी तीसरे शाके की लड़ाई के दिनों में एक रात्रि जब जैमल एक टूटी दीवार की मरम्मत करा रहे थे, उस समय अकबर की गोली से उनकी एक टांग बेकार हो गयी। लंगड़े जैमल को कल्ला ने अपने कंधों पर बिठाकर दूसरे दिन के युद्ध में उतारा था। उन दोनों ने मिलकर शत्रु सेना पर कहर ढा दिया। अन्त में दोनों भिन्न-भिन्न स्थानों पर वीरगति को प्राप्त हो गये। ये छतरियाँ उन्हीं की गौरवगाथाओं की याद दिलाती हैं।हनुमान पोलदुर्ग के तृतीय प्रवेश द्वार को हनुमान पोल कहा जाता है। क्योंकि पास ही हनुमान जी का मंदिर है। हनुमान जी की प्रतिमा चमत्कारिक एवं दर्शनीय हैं।गणेश पोलहनुमान पोल से कुछ आगे बढ़कर दक्षिण की ओर मुड़ने पर गणेश पोल आता है, जो दुर्ग का चौथा द्वार है। इसके पास ही गणपति जी का मंदिर है।जोड़ला पोलयह दुर्ग का पाँचवां द्वार है और छठे द्वार के बिल्कुल पास होने के कारण इसे जोड़ला पोल कहा जाता है।लक्ष्मण पोलदुर्ग के इस छठे द्वार के पास ही एक छोटा सा लक्ष्मण जी का मंदिर है जिसके कारण इसका नाम लक्ष्मण पोल है।राम पोललक्ष्मण पोल से आगे बढ़ने पर एक पश्चिमाभिमुख प्रवेश द्वार मिलता है, जिससे होकर किले के अन्दर प्रवेश कर सकते हैं। यह दरवाजा किला का सातवां तथा अन्तिम प्रवेश द्वार है। इस दरवाजे के बाद चढ़ाई समाप्त हो जाती है। इसके निकट ही महाराणाओं के पूर्वज माने जाने वाले सूर्यवंशी भगवान श्री रामचन्द्र जी का मंदिर है। यह मंदिर भारतीय स्थापत्य कला एवं हिन्दू संस्कृति का उत्कृष्ट प्रतीक है। दरवाजे से प्रवेश करने के बाद उत्तर वाले मार्ग की ओर बस्ती है तथा दक्षिण की ओर जाने वाले मार्ग से किले के कई दर्शनीय स्थल दिखते हैं।पत्ता का स्मारकरामपोल में प्रवेश करते ही सामने की तरफ लगभग ५० कदम की दूरी पर स्थित चबूतरे पर सीसोदिया पत्ता के स्मारक का पत्थर है। आमेर के रावतों के पूर्वज पत्ता सन् १५६८ में अकबर की सेना से लड़ते हुए इसी स्थान पर वीरगति को प्राप्त हुए थे। कहा जाता है कि युद्ध भूमि में एक पागल हाथी ने युद्धरत पत्ता को सूंड में पकड़कर जमीन पर पटक दिया जिससे उनकी मृत्यु हो गयी।कुकड़ेश्वर का कुण्ड तथा कुकड़ेश्वर का मंदिररामपोल से प्रवेश करने के बाद सड़क उत्तर की ओर मुड़ती है। उससे थोड़ी ही दूर पर दाहिनी ओर कुकड़ेश्वर का कुंड है, जिसके ऊपर के भाग में कुकड़ेश्वर का मंदिर है। किंवदन्तियों के अनुसार ये दोनों रचनाएं महाभारत कालीन है तथा पाण्डव पुत्र भीम से जुड़ी हैं।हिंगलू आहाड़ा के महल तथा रत्नेश्वर तालाबकुकड़ेश्वर मंदिर से आगे बढ़ने पर दाहिनी तरफ सड़क से कुछ दूर हिंगलू आहाड़ा के महल हैं। आहाड़ में रहने के कारण मेवाड़ के राजाओं का उपनाम आहाड़ा हुआ। डूंगरपुर तथा बांसवाड़े के राजा भी आहाड़ा कहलाते रहे। हिंगलू, डूंगरपुर का आहाड़ा सरदार था और इन महलों में रहता था, जिससे ये महल हिंगलू आहाड़ा के महल कहलाये। बूंदीवालों का हाड़ा के रूप में नाम प्रसिद्ध हो जाने से लोग इन महलों कोहिंगलू हाड़ा के महल कहने लगे।इन महलों में महाराणा रत्नसिंह रहते थे। इसके पास बना तालाब महाराणा ने खुद बनवाया था, जो रत्नेश्वर का कुंड (रत्नेश्वर तालाब) के नाम से जानी जाती है। तालाब के पश्चिमी किनारे पर रत्नेश्वर महादेव का एक प्राचीन मंदिर है।लाखोटा की बारीरत्नेश्वर कुंड से थोड़ी दूर पर पहाड़ी के पूर्वी किनारे के समीप लाखोटा की बारी है। यह एक छोटा सा दरवाजा है, जिससे दुर्ग के नीचे जा सकते हैं। कहा जाता है कि इसी द्वार के पास अकबर की गोली से जयमल लंगड़ा हो गया था।जैन कीर्ति स्तम्भजैन कीर्ति स्तम्भलाखोटा की बारी से राज टीले तक सड़क सीधी दक्षिण में मुड़ जाती है, उसी स्थान पर बायीं ओर ७५ फीट ऊँचा, सात मंजिलों वाला एक स्तम्भ बना है, जिसका निर्माण चौदहवीं शताब्दी में दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के बघेरवाल महाजन सा नांय के पुत्र जीजा ने करवाया था। यह स्तम्भ नीचे से ३० फुट तथा ऊपरी हिस्से पर १५ फुट चौड़ा है तथा ऊपर की ओर जाने के लिए तंग नाल बनी हुई हैं।जैन कीर्ति स्तम्भ वास्तव में आदिनाथ का स्मारक है, जिसके चारों पार्श्व पर आदिनाथ की ५ फुट ऊँची दिगम्बर (नग्न) जैन मूर्ति खड़ी है तथा बाकी के भाग पर छोटी-छोटी जैन मूर्तियाँ खुदी हुई हैं। इस स्तम्भ के ऊपर की छत्री बिजली गिरने से टूट गई थी तथा इससे इमारत को बड़ी हानि पहुँची थी। महाराणा फतह सिंह जी ने इस स्तम्भ की मरम्मत करवाई।महावीर स्वामी का मंदिरजैन कीर्ति स्तम्भ के निकट ही महावीर स्वामी का मन्दिर है। इस मंदिर का जीर्णोद्धार महाराणा कुम्भा के राज्यकाल में ओसवाल महाजन गुणराज ने करवाया थ। हाल ही में जीर्ण-शीर्ण अवस्था प्राप्त इस मंदिर का जीर्णोद्धार पुरातत्व विभाग ने किया है। इस मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है।नीलकंठ महादेव का मंदिरमहावीर स्वामी के मंदिर से थोड़ा आगे बढ़ने पर नीकण्ठ महादेव का मंदिर आता है। कहा जाता है कि महादेव की इस विशाल मूर्ति को पाण्डव भीम अपने बाजूओं में बांधे रखते थे।सूरजपोल तथा चूड़ावत साँई दास का स्मारकनीलकंठ महादेव के मंदिर के बाद किले के पूरब की तरफ एक दरवाजा है, जो सूरज पोल के नाम से जाना जाता है। यहाँ से दुर्ग के नीचे मैदान में जाने के लिए एक रास्ता बना हुआ है। इस दरवाजे के पास ही एक चबूतरा बना है, जो संलूबर के चंडावत सरदार रावत साईदास जी का स्मारक है। वे सन् १५६८ में अकबर की सेना के विरुद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।अद्बद्जी का मंदिररावत साँईदास के स्मारक से दक्षिण की तरफ जाने पर दाहिनी ओर अद्बद् (अद्भुतजी) का मंदिर है, जिसे महाराणा रायमल ने सन् १३९४ में बनवाया था। जीर्ण-शीर्ण अवस्था प्राप्त इस मंदिर की स्थापत्य कला दर्शनीय है। मंदिर में शिवलिंग है तथा उसके पीछे दीवार पर महादेव की विशाल त्रिमूर्ति है, जो देखने में समीधेश्वर मंदिर की प्रतिमा से मिलती है। अद्भुत प्रतिमा के कारण ही इस मंदिर को अद्बद् जी का मंदिर कहा जाता है।राजटीला तथा चत्रंग तालाबअद्बद्जी के मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर राजटीला नामक एक ऊँचा स्थान है। कहा जाता है कि यहीं पहले मौर्यवंशी शासक मान के महल थे। कुछ लोगों का मानना है कि प्राचीन काल में राजाओं का राज्याभिषेक इसी स्थान पर हुआ करता था। इस स्थान के पास से सड़क पश्चिम की ओर मुड़ जाती है। सड़क के पश्चिमी सिरे के पास चित्रांगद मौर्य का निर्माण कराया हुआ तालाब है, जिसको चत्रंग कहते हैं। यहाँ से अनुमानतः पौने मील दक्षिण मं। चित्तौड़ की पहाड़ी समाप्त हो जाती है और उसके नीचे कुछ ही दूरी पर चित्तोड़ी नाम की एक छोटी पहाड़ी है।चित्तौड़ी बूर्ज व मोहर मगरीदुर्ग का अंतिम दक्षिणी बूर्ज चित्तौड़ी बूर्ज कहलाता है और इस बूर्ज के १५० फीट नीचे एक छोटी-सी पहाड़ी (मिट्टी का टीला) दिखाई पड़ती है। यह टीला कृत्रिम है और कहा जाता है कि सन् १५६७ ई. में अकबर ने जब चित्तौड़ पर आक्रमण किया था, तब अधिक उपयुक्त मोर्चा इसी स्थान को माना और उस मगरी पर मिट्टी डलवा कर उसे ऊँचा उठवाया, ताकि किले पर आक्रमण कर सके। प्रत्येक मजदूर को प्रत्येक मिट्टी की टोकरी हेतु एक-एक मोहर दी गई थी। Koteladodia.blogspot.com
रानी पद्मावती का परिवार
भारतीय इतिहास के पन्नों में अत्यंत सुंदर और साहसी रानी; रानी पद्मावती का उल्लेख है। रानी पद्मावती को रानी पद्मिनी के नाम से भी जाना जाता है। रानी पद्मावती के पिता सिंघल प्रांत (श्रीलंका) के राजा थे। उनका नाम गंधर्वसेन था। और उनकी माता का नाम चंपावती था। पद्मावती बाल्य काल से ही दिखने में अत्यंत सुंदर और आकर्षक थीं। उनके माता-पिता नें उन्हे बड़े लाड़-प्यार से बड़ा किया था। कहा जाता है बचपन में पद्मावती के पास एक बोलता तोता था जिसका नाम हीरामणि रखा गया था।
रानी पद्मावती का स्वयंवर
रानी पद्मावती का स्वयंवर महाराज गंधर्वसेन नें अपनी पुत्री पद्मावती के विवाह के लिए उनका स्वयंवर रचाया था जिस में भाग लेने के लिए भारत के अगल अलग हिन्दू राज्यों के राजा-महाराजा आए थे। गंधर्वसेन के राज दरबार में लगी राजा-महाराजाओं की भीड़ में एक छोटे से राज्य का पराक्रमी राजा मल्खान सिंह भी आया था। उसी स्वयंवर में विवाहित राजा रावल रत्न सिंह भी मौजूद थे। उन्होनें मल्खान सिंह को स्वयंवर में परास्त कर के रानी पद्मिनी पर अपना अधिकार सिद्ध किया और उनसे धाम-धूम से विवाह रचा लिया। इस तरह राजा रावल रत्न सिंह अपनी दूसरी पत्नी रानी पद्मावती को स्वयंवर में जीत कर अपनी राजधानी चित्तौड़ वापस लौट गये।
चित्तौड़ राज्य
प्रजा प्रेमी और न्याय पालक राजा रावल रत्न सिंह चित्तौड़ राज्य को बड़े कुशल तरीके से चला रहे थे। उनके शासन में वहाँ की प्रजा हर तरह से सुखी समपन्न थीं। राजा रावल रत्न सिंह रण कौशल और राजनीति में निपुण थे। उनका भव्य दरबार एक से बढ़कर एक महावीर योद्धाओं से भरा हुआ था। चित्तौड़ की सैन्य शक्ति और युद्ध कला दूर-दूर तक मशहूर थी।
चित्तौड़ का प्रवीण संगीतकार राघव चेतन
चित्तौड़ राज्य में राघव चेतन नाम का संगीतकार बहुत प्रसिद्ध था। महाराज रावल रत्न सिंह उन्हे बहुत मानते थे इसीलिये राज दरबार में राघव चेतन को विशेष स्थान दिया गया था। चित्तौड़ प्रजा और वहाँ के महाराज को उन दिनों यह बात मालूम नहीं थी की राघव चेतन संगीत कला के अतिरिक्त जादू-टोना भी जनता था। ऐसा कहा जाता है की राघव चेतन अपनी इस आसुरी प्रतिभा का उपयोग शत्रु को परास्त करने और अपने कार्य सिद्ध करने में करता था। एक दिन राघव चेतन जब अपना कोई तांत्रिक कार्य कर रहा था तब उसे रंगे हाथों पकड़ लिया गया और राजदरबार में राजा रावल रत्न सिंह के समक्ष पेश कर दिया गया। सभी साक्ष्य और फरियादी पक्ष की दलील सुन कर महाराज नें चेतन राघव को दोषी पाया और तुरंत उसका मुंह काला करा कर गधे पर बैठा कर देश निकाला दे दिया।
अलाउद्दीन खिलजी से मिला राघव चेतन
अपने अपमान और राज्य से निर्वासित किये जाने पर राघव चेतन बदला लेने पर आमादा हो गया। अब उसके जीवन का एक ही लक्ष्य रहे गया था और वह था चित्तौड़ के महाराज रावल रत्न सिंह का सम्पूर्ण विनाश। अपने इसी उद्देश के साथ वह दिल्ली राज्य चला गया। वहां जाने का उसका मकसद दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन खिलजी को उकसा कर चित्तौड़ पर आक्रमण करवा कर अपना प्रतिशोध पूरा करने का था। 12वीं और 13वीं सदी में दिल्ली की गद्दी पर अलाउद्दीन खिलजी का राज था। उन दिनों दिल्ली के बादशाह से मिलना इतना आसान कार्य नहीं था। इसीलिए राघव चेतन दिल्ली के पास स्थित एक जंगल में अपना डेरा डाल कर रहने लगता है क्योंकि वह जानता था कि दिल्ली का बादशाह अलाउद्दीन खिलजी शिकार का शौक़ीन है और वहाँ पर उसकी भेंट ज़रूर अलाउद्दीन खिलजी से हो जाएगी। कुछ दिन इंतज़ार करने के बाद आखिर उसे सब्र का फल मिल जाता है।
एक दिन अलाउद्दीन खिलजी अपने खास सुरक्षा कर्मी लड़ाकू दस्ते के साथ घने जंगल में शिकार खेलने पहुँचता है। मौका पा कर ठीक उसी वक्त राघव चेतन अपनी बांसुरी बजाना शुरू करता है। कुछ ही देर में बांसुरी के सुर बादशाह अलाउद्दीन खिलजी और उसके दस्ते के सिपाहियों के कानों में पड़ते हैं। अलाउद्दीन खिलजी फ़ौरन राघव चेतन को अपने पास बुला लेता है राज दरबार में आ कर अपना हुनर प्रदर्शित करने का प्रस्ताव देता है। तभी चालाक राघव चेतन अलाउद्दीन खिलजी से कहता है-
आप मुझ जैसे साधारण कलकार को अपनें राज्य दरबार की शोभा बना कर क्या पाएंगे, अगर हासिल ही करना है तो अन्य समपन्न राज्यों की ओर नज़र दौड़ाइये जहां एक से बढ़ कर एक बेशकीमती नगीने मौजूद हैं और उन्हे जीतना और हासिल करना भी सहज है।
अलाउद्दीन खिलजी तुरंत राघव चेतन को पहेलिया बुझानें की बजाए साफ-साफ अपनी बात बताने को कहता हैं। तब राघव चेतन चित्तौड़ राज्य की सैन्य शक्ति, चित्तौड़ गढ़ की सुरक्षा और वहाँ की सम्पदा से जुड़ा एक-एक राज़ खोल देता है और राजा रावल रत्न सिंह की धर्म पत्नी रानी पद्मावती के अद्भुत सौन्दर्य का बखान भी कर देता है। यह सब बातें जान कर अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ राज्य पर आक्रमण कर के वहाँ की सम्पदा लूटने, वहाँ कब्ज़ा करने और परम तेजस्वी रूप रूप की अंबार रानी पद्मावती को हासिल करने का मन बना लेता है।
अलाउद्दीन खिलजी की चित्तौड़ राज्य पर आक्रमण की योजना
राघव चेतन की बातें सुन कर अलाउद्दीन खिलजी नें कुछ ही दिनों में चित्तौड़ राज्य पर आक्रमण करने का मन बना लिया और अपनी एक विशाल सेना चित्तौड़ राज्य की और रवाना कर दी। अलाउद्दीन खिलजी की सेना चित्तौड़ तक पहुँच तो गयी पर चित्तौड़ के किले की अभेद्य सुरक्षा देख कर अलाउद्दीन खिलजी की पूरी सेना स्तब्ध हो गयी। उन्होने वहीं किले के आस पास अपने पड़ाव डाल लिए और चित्तौड़ राज्य के किले की सुरक्षा भेदने का उपाय ढूँढने लगे।
अलाउद्दीन खिलजी नें राजा रावल रत्न सिंह को भेजा कपट संदेश
जब से राजा रावल रत्न सिंह नें रूप सुंदरी रानी पद्मावती को स्वयमर में जीता था तभी से पद्मावती अपनी सुंदरता के लिये दूर-दूर तक चर्चा का विषय बनी हुई थी। इस बात का फायदा उठाते हुए कपटी अलाउद्दीन खिलजी नें चित्तौड़ किले के अंदर राजा रावल रत्न सिंह के पास एक संदेश भिजवाया कि वह रानी पद्मावती की सुंदरता का बखान सुन कर उनके दीदार के लिये दिल्ली से यहाँ तक आये हैं और अब एक बार रूप सुंदरी रानी पद्मावती को दूर से देखने का अवसर चाहते हैं। अलाउद्दीन खिलजी नें यहाँ तक कहा की वह रानी पद्मावती को अपनी बहन समान मानते हैं और वह सिर्फ उसे दूर से एक नज़र देखने की ही तमन्ना रखते हैं।
अलाउद्दीन खिलजी नें दिया धोखा
शर्त अनुसार चित्तौड़ के महाराज ने अलाउद्दीन खिलजी को आईने में रानी पद्मावती का प्रतिबिंब दिखला दिया और फिर अलाउद्दीन खिलजी को खिला-पिला कर पूरी महेमान नवाज़ी के साथ चित्तौड़ किले के सातों दरवाज़े पार करा कर उनकी सेना के पास छोड़ने खुद गये। इसी अवसर का लाभ ले कर कपटी अलाउद्दीन खिलजी नें राजा रावल रत्न सिंह को बंदी बना लिया और किले के बाहर अपनी छावनी में कैद कर दिया। इसके बाद संदेश भिजवा दिया गया कि
अगर महाराज रावल रत्न सिंह को जीवित देखना है तो रानी पद्मावती को फौरन अलाउद्दीन खिलजी की खिदमद में किले के बाहर भेज दिया जाये।
रानी पद्मावती, चौहान राजपूत सेनापति गौरा और बादल की युक्ति
चित्तौड़ राज्य के महाराज को अलाउद्दीन खिलजी की गिरफ्त से सकुशल मुक्त कराने के लिये रानी पद्मावती, गौरा और बादल नें मिल कर एक योजना बनाई। इस योजना के तहत किले के बाहर मौजूद अलाउद्दीन खिलजी तक यह पैगाम भेजना था की रानी पद्मावती समर्पण करने के लिये तैयार है और पालकी में बैठ कर किले के बाहर आने को राज़ी है। और फिर पालकी में रानी पद्मावती और उनकी सैकड़ों दासीयों की जगह नारी भेष में लड़ाके योद्धा भेज कर बाहर मौजूद दिल्ली की सेना पर आक्रमण कर दिया जाए और इसी अफरातफरी में राजा रावल रत्न सिंह को अलाउद्दीन खिलजी की कैद से मुक्त करा लिया जाये।
रानी पद्मावती के इंतज़ार में बावरा हुआ अलाउद्दीन खिलजी
कहा जाता है की वासना और लालच इन्सान की बुद्धि हर लेती है। अलाउद्दीन खिलजी के साथ भी ऐसा ही हुआ। जब चित्तौड़ किले के दरवाज़े एक के बाद एक खुले तब अंदर से एक की जगह सैकड़ों पालकियाँ बाहर आने लगी। जब यह पूछा गया की इतनी सारी पालकियाँ क्यूँ साथ हैं तब अलाउद्दीन खिलजी को यह उत्तर दिया गया की यह सब रानी पद्मावती की खास दासीयों का काफिला है जो हमेशा उनके साथ जाता है। अलाउद्दीन खिलजी रानी पद्मावती पर इतना मोहित था की उसने इस बात की पड़ताल करना भी ज़रूरी नहीं समझा की सभी पालकियों को रुकवा कर यह देखे कि उनमें वाकई में दासियाँ ही है। और इस तरह चित्तौड़ का एक पूरा लड़ाकू दस्ता नारी भेष में किले के बाहर आ पहुंचा। कुछ ही देर में अलाउद्दीन खिलजी नें रानी पद्मावती की पालकी अलग करवा दी और परदा हटा कर उनका दीदार करना चाहा। तो उसमें से राजपूत सेनापति गौरा निकले और उन्होने आक्रमण कर दिया। उसी वक्त चित्तौड़ सिपाहीयों नें भी हमला कर दिया और वहाँ मची अफरातफरी में बादल नें राजा रावल रत्न सिंह को बंधन मुक्त करा लिया और उन्हे अलाउद्दीन खिलजी के अस्तबल से चुराये हुए घोड़े पर बैठा कर सुरक्षित चित्तौड़ किले के अंदर पहुंचा दिया। इस लड़ाई मे राजपूत सेनापति गौरा और पालकी के संग बाहर आये सभी योद्धा शहीद हो गये।
अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण
अपनी युक्ति नाकाम हो जाने की वजह से बादशाह अलाउद्दीन खिलजी झल्ला उठा उसनें उसी वक्त चित्तौड़ किले पर आक्रमण कर दिया पर वे उस अभेद्य किले में दाखिल नहीं हो सके। तब उन्होने किले में खाद्य और अन्य ज़रूरी चीजों के खत्म होने तक इंतज़ार करने का फैसला लिया। कुछ दिनों में किले के अंदर खाद्य आपूर्ति समाप्त हो गयी और वहाँ के निवासी किले की सुरक्षा से बाहर आ कर लड़ मरने को मजबूर हो गये। अंत में रावल रत्न सिंह नें द्वार खोल कर आर- पार की लड़ाई लड़ने का फैसला कर लिया और किले के दरवाज़े खोल दिये। किले की घेराबंदी कर के राह देख रहे मौका परस्त अलाउद्दीन खिलजी ने और उसकी सेना नें दरवाज़ा खुलते ही तुरंत आक्रमण कर दिया। इस भीषण युद्ध में पराक्रमी राजा रावल रत्न सिंह वीर गति हो प्राप्त हुए और उनकी पूरी सेना भी हार गयी। अलाउद्दीन खिलजी नें एक-एक कर के सभी राजपूत योद्धाओं को मार दिया और किले के अंदर घुसने की तैयारी कर ली।
महारानी पद्मावती और सभी महिलाओं नें लिया जौहर करने का फैसला
युद्ध में राजा रावल रत्न सिंह के मारे जाने और चित्तौड़ सेना के समाप्त हो जाने की सूचना पाने के बाद रानी पद्मावती जान चुकी थी कि अब अलाउद्दीन खिलजी की सेना किले में दाखिल होते ही चित्तौड़ के आम नागरिक पुरुषों और बच्चों को मौत के घाट उतार देगी और औरतों को गुलाम बना कर उन पर अत्याचार करेगी। इसलिये राजपूतना रीति अनुसार वहाँ की सभी महिलाओं नें जौहर करने का फैसला लिया।
जौहर की रीति निभाने के लिए नगर के बीच एक बड़ा सा अग्नि कुंड बनाया गया और रानी पद्मावती और अन्य महिलाओं ने एक के बाद एक महिलायेँ उस धधकती चिता में कूद कर अपने प्राणों की बलि दे दी।
इतिहास में राजा रावल रत्न सिंह, रानी और पद्मावती, सेना पति गौरा और बादल का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है और चित्तौड़ की सेना वहाँ के आम नागरिक भी सम्मान के साथ याद किये जाते हैं जिनहोने अपनी जन्म भूमि की रक्षा के खातिर अपने प्राणों का बलिदान दिया।
राजस्थान की प्रमुख झीले
जयसमंद झील /ढेबर झील (उदयपुर)
राजस्थान में मीठे पानी की सबसे बड़ी कृत्रिम झील जयसमंद है। इस झील का निर्माण मेवाड़ के राणा जयसिंह ने गोमती नदी झामरी व बगार नदीयों का पानी रोककर(1687-91) कराया गया। इस झील में छोटे-बडे़ सात टापू है। इनमें सबसे बडे़ टापू का नाम बाबा का भगड़ा/भकड़ा है और उससे छोटे का नाम प्यारी है। इन टापूओं पर आदिवासी समुदाय के लोग निवास करते है। जयसंमद झील से उदयपुर जिले को पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। जयसंमद झील को पर्यटन केन्द्र के रूप में भी विकसित किया जा रहा है। इस झील से श्यामपुरा व भट्टा दो नहरें भी निकाली गई है।
राजसमंद झील (राजसमंद)
इसका निर्माण मेवाड़ के राजा राजसिंह ने गोमती नदी का पानी रोककर (1662-76) इस झील का निर्माण करवाया गया। इस झील का उतरी भाग "नौ चैकी" कहलाता है। यही पर 25 काले संगमरमर की चट्टानों पर मेवाड़ का पूरा इतिहास संस्कृत में उत्कीर्ण है। इसे राजप्रशस्ति कहते है जो की संसार की सबसे बड़ी प्रशस्ति है। राजप्रशस्ति अमरकाव्य वंशावली नामक पुस्तक पर आधारित है जिसके लेखक - रणछोड़ भट्ट तैलंग है। इसके किनारे "घेवर माता" का मन्दिर है।
पिछोला झील (उदयपुर)
14 वीं सदी में इस मीठे पानी की झील का निर्माण राणा लाखा के समय एक पिच्छू नामक बनजारे ने अपने बैल की स्मृति में करवाया। पिछौला में बने टापूओं पर 'जगमन्दिर(लैक पैलेस)' व 'जगनिवास(लैक गार्डन पैलेस)' महल बने हुए है। मुगल शासक शाहजहां ने अपने पिता से विद्रोह के समय यहां शरण ली थी। वर्तमान में इसे पर्यटन केन्द्र के रूप में इन महलों को "लेक पैलेस" के रूप में विकसित किया जा रहा है। इस झील के समीप "गलकी नटणी" का चबुतरा बना हुआ है। इस झील के किनारे "राजमहल/सिटी पैलेस" है। सीसाराम व बुझडा नदियां इस झील को जलापूर्ति करती है। जगमन्दिर महल में ही 1857 ई. में राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान महाराणा स्वरूप ने नीमच की छावनी से भागकर आए 40 अंग्रेजो को षरण देकर क्रांन्तिकारियों से बचाया था। जगनिवास महल का निर्माण महाराणा जगत सिंह ने 1746 ई. में करवाया था।
आनासागर झील (अजमेर)
अजमेर शहर के मध्य स्थित इस झील का निर्माण अजयराज के पुत्र अर्णाेराज ने 1137 ई. में करवाया। पहाड़ो के मध्य स्थित होने के कारण यह झील अत्यन्त मनोरम दृष्य प्रस्तुत करती है अतः मुगलशासक जांहगीर ने इसके समीप दौलतबाग का निर्माण करवाया जिसे वर्तमान में सुभाष उद्यान कहते है। शाहजहां ने यहा पर 12 दरी का निर्माण करवाया ।
नक्की झील
राजस्थान के सिरोही जिले मे माऊंट आबू पर स्थित नक्की झील राजस्थान की सर्वाधिक ऊंचाई पर तथा सबसे गहरी झील है। झील का निर्माण ज्वालामुखी उद्भेदन से हुआ अर्थात यह एक प्राकृतिक झील है। मान्यता के अनुसार इस झील की खुदाई देवताओं ने अपने नाखुनों से की थी अतः इसे नक्की झील कहा जाता है। यह झील पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है। इस झील में टापू है जिस पर रघुनाथ जी का मन्दिर बना है। इसके अलावा इस झील के एक तरफ मेंढक जैसी चट्टान बनी हुई है जिसे "टाॅड राॅक" कहा जाता है। एक चट्टान की आकृति महिला के समान है जिसे "नन राॅक" कहा जाता है। एक आकृति लड़का-लड़की जैसी है जिसे "कप्पल राॅक" कहा जाता है। इसके अलावा यहाँ हाथी गुफा, चंम्पा गुफा, रामझरोखा, पैरट राॅक अन्य दर्शनीय स्थल है। यह झील गरसिया जनजाति का आध्यात्मिक केन्द्र है। अतः लोग अपने मृतको की अस्थियों का विसृजन नक्की झील में ही करते है। इसके समीप ही "अर्बुजा देवी" का मन्दिर स्थित है। अतः इस पर्वत को आबू पर्वत कहा जाता है।
पुष्कर झील
राजस्थान के अजमेर जिले में अजमेर शहर से 12 कि.मी. की दूरी पर पुष्कर झील का निर्माण ज्वालामुखी उद्भेदन से हुआ है। यह झील भी प्राकृतिक झील है।यह राजस्थान का सबसे पवित्र सरोवर माना जाता है।इसलिए इसे आदितीर्थ/पांचनातीर्थ/कोंकणतीर्थ/तीर्थो का मामा/तीर्थराज भी कहा जाता है। पुष्कर झील के बारे में मान्यता है कि खुदाई पुष्कर्णा ब्राह्मणों द्वारा कराई गई। अतः पुष्कर झील की संज्ञा दी गई। तथा किवदन्ती के अनुसार इस झील का निर्माण ब्रह्माजी के हाथ से गिरे तीन कमल के पुष्पों से हुआ जिससे क्रमशः वरीष्ठ पुष्कर, मध्यम पुष्कर, कनिष्ठ पुष्कर का निर्माण हुआ। महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने यहां स्नान किया, महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना की, विश्वामित्र ने यहां तपस्या कि, वेदोें को यहां अंतिम रूप से संकलन हुआ। इस झील के चारों ओर अनेक प्राचीन मन्दिर है। इनमें ब्रह्माजी का मन्दिर सबसे प्राचीन है जिसका निर्माण 10 वीं शताब्दी में पंडित गोकुलचन्द पारीक ने करवाया था। इसी मंिन्दर के सामने पहाड़ी पर ब्रह्मा जी की पत्नि ??सावित्री देवी?? का मन्दिर है। जिसमें माँ सरस्वती की प्रतिमा भी लगी हुई है।(राजस्थान के बाड़मेर जिले में आसोतरा नामक स्थान पर एक अन्य ब्रह्मा मन्दिर भी है।)
पुष्कर झील के चारों ओर 52 घाट बने हुए है। इन घाटों पर लोग अपने पित्तरों का लोकर्पण करते है।कार्तिक पूर्णीमा को यहां मेला लगता है दिपदान कि क्रिया होती है आय की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बडा मेला है यहां पर एक महिला घाट भी बना हुआ है जिसे वर्तमान में गांधी घाट कहा जाता है। इसका निर्माण 1912 में मैडम मेरी ने करवाया था। गांधी जी की इच्छा पर उनकी अस्थियों का विसृजन पुष्कर झील में ही किया गया था। इनमें जयपुर घाट सबसे बड़ा है। पुष्कर में राजस्थान में दक्षिण भारतीय शैली का सबसे बड़ा मन्दिर श्री रंग जी का मन्दिर भी बना हुआ है। पुष्कर में आई मिट्टी को साफ करने में 1998 में कनाडा सरकार ने आर्थिक सहायता प्रदान की। पुष्कर के राताड्ढंगा में नाथ पंथ की बैराग शाखा की गद्दी बनी है।
पुष्कर के पंचकुण्ड को मृगवन घोषित किया।
फतहसागर झील (उदयपुर)
राज. के उदयपुर जिले में स्थित इस मीठे पानी की झील का निर्माण मेवाड के शासक जयसिंह ने 1678 ई. में करवाया। बाद में यह अतिवृष्टि होने के कारण नष्ट हो गई। तब इसका पुर्निमाण 1889 में महाराजा फतेहसिंह ने करवाया तथा इसकी आधार शिला ड्यूक आॅफ कनाॅट द्वारा रखी गई। अतः इस झील को फतहसागर झील कहा गया। इस झील में टापु है जिस पर नेहरू उधान बना है इस झील में शोर वैदशाला भी बनी है।
फतहसागर झील में अहम्दाबाद संस्थान ने 1975 में भारत की पहली सौर वैधषाला स्थापित की। इसी झील के समीप बेल्जियम निर्मित टेलिस्कोप की स्थापना सूर्य और उसकी गतिविधियों के अध्ययन के लिए की गई। फतहसागर झील से उदयपुर को पेय जल की आपूर्ति की जाती है।
उदयपुर के देवाली गांव में स्थित होने के कारण इसे देवाली तालाब भी कहा जाता है।
कोलायत झील (बीकानेर)
राजस्थान के बीकानेर जिले में स्थित इस मीठे पानी की झील के समीप साख्य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि का आश्रम है। इस आश्रम को "राजस्थान का सुन्दर मरूद्यान" भी कहा जाता है। यह आश्रम एन.एच.-15 पर स्थित है।
कोलायत झील की उत्पति कपिल मुनि ने अपनी माता की मुक्ति के लिए की। यहीं पर कार्तिक मास की पूर्णिमा (नवम्बर) माह में मेला भरता है। इस झील में दीप जला कर अर्पण किया जाता है। समीप ही यहां एक शिवालय है जिसमें 12 शिवलिंग है।
सीलीसेठ झील
यह झील अलवर में स्थित है। इसके किनारे अलवर के महाराजा विनयसिंह ने 1845 में अपनी रानी के लिए एक शाही महल (लैक पैलेस) एक शिकारी लौज का निर्माण करवाया।
उदयसागर झील
यह उदयपुर में स्थित है। इसका निर्माण मेवाड के शासक उदयसिंह ने आयड़ नदी के पानी को रोककर करवाया। इस झील से निकलने के बाद हि आयड़ का नाम बेड़च हो जाता है।
फायसागर झील
यह अजमेर में स्थित है। इसका निर्माण बाण्डी नदी(उत्पाती नदी) के पानी को रोककर करवाया गया इसे अंग्रेज इजि. फाॅय के निर्देशन में बनाया गया। इसलिए इसे फाॅय सागर कहते है।
बालसमंद झील
जोधपुर मण्डोर मार्ग पर स्थित है। इसका निर्माण 1159 में परिहार शासक बालकराव ने करवाया। इस झील के मध्य महाराजा सुरसिंह ने अष्ट खम्भा महल बनाया।
साॅंम्भर झील
यह झील जयपुर की फुलेरा तहसील में स्थित है। बिजोलिया शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण चैहान शासक वासुदेव ने करवाया था। यह भारत में खारे पानी की आन्तरिक सबसे बड़ी झील है इसमें खारी, खण्डेला, मेन्था, रूपनगढ नदियां आकर गिरती है।
यह देश का सबसे बड़ा आन्तरिक स्त्रोत है यहां मार्च से मई माह के मध्य नमक बनाने का कार्य किया जाता है। यहां पर रेशता नमक, क्यार नमक दो विधियों से तैयार होता है। यहां नमक केन्द्र सरकार के उपक्रम "हिन्दुस्तान साॅल्ट लिमिटेड" की सहायक कम्पनी 'सांभर साल्ट लिमिटेड' द्वारा तैयार किया जाता है।
भारत के कुल नमक उत्पादन का 8.7 प्रतिशत यहां से उत्पादित होता है।
पंचभद्रा (बाड़मेर)
राजस्थान के बाड़मेर जिले के बालोत्तरा के पास स्थित है। इस झील का निर्माण पंचा भील के द्वारा कराया गया अतः इसे पंचभद्रा कहते है। इस झील का नमक समुद्री झील क ेनमक से मिलता जुलता है। इस झील से प्राप्त नमक में 98 प्रतिषत मात्रा सोडियम क्लोराइड है। अतः यहां से प्राप्त नमक उच्च कोटी है। इस झील से प्राचीन समय से ही खारवाल जाति के 400 परिवार मोरली वृक्ष की टहनियों से नमक के (क्रीस्टल) स्फटिक तैयार करते है।
डीडवाना झील (नागौर)
राजस्थान के नागौर जिले में लगभग 4 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैली इस झील में सोडियम क्लोराइड की बजाय सोडियम स्लफेट प्राप्त होता है। अतः यहां से प्राप्त नमक खाने योग्य नहीं है। इसलिए यहां का नमक विभिन्न रासायनिक क्रियाओं में प्रयुक्त होता है।
इस झील के समीप ही राज्य सरकार द्वारा "राजस्थान स्टेट केमिकलवक्र्स" के नाम से दो इकाईयां लगाई है जो सोडियम सल्फेट व सोडियम सल्फाइट का निर्माण करते है। थोड़ी बहुत मात्रा में यहां पर नमक बनाने का कार्य 'देवल' जाती के लोगों द्वारा किया जाता है।
लूणकरणसर (बीकानेर)
राजस्थान के बीकानेर जिले में स्थित यह झील अत्यन्त छोटी है। परिणामस्वरूप यहां से थोडी बहुत मात्रा में नमक स्थानीय लोगो की ही आपूर्ति कर पाता है।
लूणकरणसर मूंगफली के लिए प्रसिद्ध होने के राजस्थान का राजकोट कहलाता है।
Jashwant Singh Dodia tikana-kotela
Koteladodia.blogspot.com
मंगलवार, 2 जनवरी 2018
🚩ठिकाना -कोटेला के दर्शनीय स्थल 🚩
1⃣एकपन्या बावजी मंदिर
2⃣हिंगलाज माता मंदिर 1
3⃣भोले नाथ जी मंदिर
4⃣श्रीराम हनुमानजी मंदिर
5⃣खत्री बाबा मंदिर
6⃣शिवजी आम के वृक्ष के नीचे
7⃣माता जी का मंदिर 2
8⃣गणेश मंदिर विसर्जित तक
9⃣दशामाता पुजन स्थान
🔟जय चारभूजा जी मंदिर
➡एकपन्या बावजी मंदिर कोटेला का विशेष मंदिर है । यहा पर रविवार को कई भक्त दर्शन करने के लिए आते है ।
➡हिंगलाज माता मंदिर कोटेला गांव मे स्थित है । यहा पर रविवार को पुजा होती है । यहा पर मंदिर के आसपास के लोग आते है । यहाँ पर चोरा है , जो कोटेला का चोरा नाम से जाना जाता है । जिस पर गवरी कार्यक्रम होता है । कोई भी बैठक बुलानी हो तो यही पर बुलाते है । कोटेला के चोरा पर ही गणपति महाराज विराजमान होते है , विसर्जन तक ।
गैर कार्यक्रम यही पर होता है।
यहा पर 1990 के लगभग इसी मंदिर मे स्कूल चलती थी । यहाँ पर सार्वजनिक कार्यक्रम या कोई निर्माण कार्य से सम्बंधित राजपुत समाज द्वारा निर्णय लिया जाता है । हिन्गलाज माता नागनेची माता चामुंडा माता ये तिनो माता विराजमान है ।
जय माता हिन्गलाज ।
➡भोले नाथ जी मंदिर कोटेला गांव मे स्थित है । यहाँ पर कोटेला गांव के लोग सोमवार के दिन पुजा करते है । यहा पर मनसावाचा कथा का पाठ किया जाता है , सोलह सोमवार व्रत के समय श्रावण के पहले सोमवार से कार्तिक शुदी चोथ तक ।
यहाँ पर शिवरात्री के समय कथा कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। ॐ नमः शिवाय
➡हनुमान जी मंदिर कोटेला गांव मे स्थित है । यहा पर कोटेला के लोग मंगलवार को पुजन करते है । और उनसे मनोकामना पूर्ण करने का आशिस प्राप्त करते है ।
राम लक्ष्मण जानकी जय बोलो हनुमान को
➡खत्री बाबा मंदिर कोटेला गांव मे स्थित है । यहा पर भिल समाज के लोग रविवार को पुजन करते है ।यहा पर रात्रि जागरण कार्यक्रम भी होता । नवरात्रा मे यहा साउन्ड बजते है । भिल समाज के लोग वही पर सोते है । यहा पर आरती सेवा भाव सब होता है, नवरात्रा में ।
जय खत्री बाबा
➡शिवजी कोटेला गांव मे विराजमान है , आम के वृक्ष के नीचे यहा पर एक पत्थर पर विराजमान है , शिव यहा पर चार दिवारी मे नही है । खुले मे बैठे शिव शम्भू ।
➡माताजी मंदिर कोटेला गांव मे स्थित है । माता जी का यह दूसरा मंदिर है
➡गणेश प्रतिमा गणेश चतुर्थी के दिन स्थापित कि जाती है । विसर्जन तक कोटेला के चोरा पर विराजमान होते है । यहा पर यूवा डांस करते है । साउंड की धूम मे । विसर्जन के समय डिजे कि धुंध मे नाचते हुए पहुंचाते गणपति को अपनी माता के पास ।
जय श्री गजानंद महाराज
➡दशामाता पुजन स्थान फसोरा कोटेला गांव मे स्थित है । यहा पर दशामाता की पूजा की जाती है । दशामाता के विशेष अवसर पर यहा बहुत भक्तजन आते है
➡चारभूजा मंदिर कोटेला गांव मे शिशोदा रोड पर स्थित है ।यहा पर कोटेला के बन्ना व बाईसा की बंदोली बागोल से आने के बाद कोटेला के चारभूजा जी का आशीर्वाद लेते है । गर्मी के समय यहा पर जल सेवा की जाती है ।
जय चारभूजा नाथ
1⃣एकपन्या बावजी मंदिर
2⃣हिंगलाज माता मंदिर 1
3⃣भोले नाथ जी मंदिर
4⃣श्रीराम हनुमानजी मंदिर
5⃣खत्री बाबा मंदिर
6⃣शिवजी आम के वृक्ष के नीचे
7⃣माता जी का मंदिर 2
8⃣गणेश मंदिर विसर्जित तक
9⃣दशामाता पुजन स्थान
🔟जय चारभूजा जी मंदिर
➡एकपन्या बावजी मंदिर कोटेला का विशेष मंदिर है । यहा पर रविवार को कई भक्त दर्शन करने के लिए आते है ।
➡हिंगलाज माता मंदिर कोटेला गांव मे स्थित है । यहा पर रविवार को पुजा होती है । यहा पर मंदिर के आसपास के लोग आते है । यहाँ पर चोरा है , जो कोटेला का चोरा नाम से जाना जाता है । जिस पर गवरी कार्यक्रम होता है । कोई भी बैठक बुलानी हो तो यही पर बुलाते है । कोटेला के चोरा पर ही गणपति महाराज विराजमान होते है , विसर्जन तक ।
गैर कार्यक्रम यही पर होता है।
यहा पर 1990 के लगभग इसी मंदिर मे स्कूल चलती थी । यहाँ पर सार्वजनिक कार्यक्रम या कोई निर्माण कार्य से सम्बंधित राजपुत समाज द्वारा निर्णय लिया जाता है । हिन्गलाज माता नागनेची माता चामुंडा माता ये तिनो माता विराजमान है ।
जय माता हिन्गलाज ।
➡भोले नाथ जी मंदिर कोटेला गांव मे स्थित है । यहाँ पर कोटेला गांव के लोग सोमवार के दिन पुजा करते है । यहा पर मनसावाचा कथा का पाठ किया जाता है , सोलह सोमवार व्रत के समय श्रावण के पहले सोमवार से कार्तिक शुदी चोथ तक ।
यहाँ पर शिवरात्री के समय कथा कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। ॐ नमः शिवाय
➡हनुमान जी मंदिर कोटेला गांव मे स्थित है । यहा पर कोटेला के लोग मंगलवार को पुजन करते है । और उनसे मनोकामना पूर्ण करने का आशिस प्राप्त करते है ।
राम लक्ष्मण जानकी जय बोलो हनुमान को
➡खत्री बाबा मंदिर कोटेला गांव मे स्थित है । यहा पर भिल समाज के लोग रविवार को पुजन करते है ।यहा पर रात्रि जागरण कार्यक्रम भी होता । नवरात्रा मे यहा साउन्ड बजते है । भिल समाज के लोग वही पर सोते है । यहा पर आरती सेवा भाव सब होता है, नवरात्रा में ।
जय खत्री बाबा
➡शिवजी कोटेला गांव मे विराजमान है , आम के वृक्ष के नीचे यहा पर एक पत्थर पर विराजमान है , शिव यहा पर चार दिवारी मे नही है । खुले मे बैठे शिव शम्भू ।
➡माताजी मंदिर कोटेला गांव मे स्थित है । माता जी का यह दूसरा मंदिर है
➡गणेश प्रतिमा गणेश चतुर्थी के दिन स्थापित कि जाती है । विसर्जन तक कोटेला के चोरा पर विराजमान होते है । यहा पर यूवा डांस करते है । साउंड की धूम मे । विसर्जन के समय डिजे कि धुंध मे नाचते हुए पहुंचाते गणपति को अपनी माता के पास ।
जय श्री गजानंद महाराज
➡दशामाता पुजन स्थान फसोरा कोटेला गांव मे स्थित है । यहा पर दशामाता की पूजा की जाती है । दशामाता के विशेष अवसर पर यहा बहुत भक्तजन आते है
➡चारभूजा मंदिर कोटेला गांव मे शिशोदा रोड पर स्थित है ।यहा पर कोटेला के बन्ना व बाईसा की बंदोली बागोल से आने के बाद कोटेला के चारभूजा जी का आशीर्वाद लेते है । गर्मी के समय यहा पर जल सेवा की जाती है ।
जय चारभूजा नाथ
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