गुरुवार, 4 जनवरी 2018

                   सरदारगढ़ हेरिटेज               

कांकरोली राजसमंद से आमेट की तरफ मार्ग 16-18 किलोमीटर दूर जाने पर आता है लावा सरदारगढ़ । सरदारगढ़ का यह एतिहासिक किला अब एक हेरिटज होटल से रुप में तब्दील कर दिया गया है। वर्षों से यह सरदारगढ़, जैसे अपने अस्तित्व को बचाने में लगा हुआ था । यह एक बहुत विशाल किला है, और थोडी उंचाई पर बना हुआ है इसलिये काफी दूर से ही दिखाई देता है । नाम से ही लगता है कि ईसे सरदारसिंह जी ने सन 1738 से 1743 के दौरान बनवाया था ।

यह सरदारगढ़ अब राजसमंद की मुख्य हेरिटेज होटलों में से एक है। यहां लगभग सारी लग्जरी सुविधाएं एक ही छत के नीचे उपलब्ध हैं। पार्किंग, स्वीमिंग पूल, स्वादिष्ट भोजन, ठहरना, आस पास के साईट सीन, उंट व घुडसवारी, डाक्टर आन काल, ड्राइक्लिन, संग्रहालय एवं लोक नृत्य आदि सारी सुविधाएं यहां पर्यटकों को उपलब्ध हैं । ठहरने के लिये यहां आलीशान 21 कमरे हें, जो राजसी ठाठ बाठ का सा आभास कराते हैं ।

सरदारगढ़ हेरिटेज होटल पर काफी पर्यटक आते है । खासतोर से विदेशी पर्यटक जो देवगढ़ महल होटल, देवीगढ़ रिजोर्ट व ओदी होटल पर आते है, अब सरदारगढ़ हेरिटेज होटल भी उन सभी के लिये एक महत्वपुर्ण जगह बन चुका है । यहां से कुम्भलगढ़, रणकपुर, चारभुजा, नाथद्दारा व कांकरोली घुमने के लिये जाया जा सकता है । 

 मुख्य होटल संचालक महिपाल सिंह डोडिया
 

यह डोडिया राजपुत का ठिकाना है ।
यह मेवाड़ का महत्त्वपूर्ण ठिकाना है ।

यही से  डोडिया राजपुत बागोल आये थे  उसके बाद ठिकाना कोटेला मे आये ।

सरदारगढ़ से  महिपाल सिंह जी विशेष अवसर पर कोटेला पदार्ते है ।

My name jashwant singh dodia rajput village kotela  (sardargarh )

मोलेला 



मोलेला गांव नाथद्धारा से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस मोलेला गांव का मृण शिल्प या कह सकते है टेराकोटा आर्ट विश्व प्रसिद्ध है। यहां के कई कलाकार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक जाकर अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। मृण शिल्प और टेराकोटा की कला से यहां के कलाकार जैसे मिट्टी में भी प्राण फूंक देते हैं।  ये कलाकार अपने शिल्प से दिपावली के विभीन्न प्रकार के दीये, श्रीनाथजी, महाराणा प्रताप, हाथी, घोडे, बेल, दीपक के स्टेण्ड, गणेश जी, तरह तरह की घंटीयां, स्थानीय लोक देवताओं आदि के सजीव मृण शिल्प बनाते हैं ।


ये मोलेला के मृणशिल्पकार गीली मिट्टी को विभीन्न सांचों मे डालते हैं, बाद में कई तरह के भिन्न भिन्न औजारों के द्धारा उस शिल्प के रुप को ओर भी सजाया व संवारा जाता है । ततपश्चात ईसे आंच में पकाया जाता है, ताकि यह ओर भी अधिक मजबुत हो जाए । अन्त में टेराकोटा कलर, चुने व अन्य रंगों का उपयोग करते हुए ईसे ओर अधिक आकर्षक बनाया जाता है ।  बाहर से कई विदेशी सैलानी यहां आते है, और कई तो काफी दिन तक यहां रुककर ईन कलाकारों से खास ट्रेनिंग भी लेते हैं। ये कलाकार अपनी देखरेख में ईनको सिखाते भी हैं । टेराकोटा कला के यह विभीन्न नमुने आजकल बाजार में वृहद पेमाने पर बिकते हैं । चाहे खादी मेला हो, शिल्पग्राम उत्सव हो या कोई भी छोटा मोटा मेला या इस प्रकार का कोई आयोजन हो और वहां मोलेला का मृण शिल्प ना पहुंचे ए॓सा संभव ही नहीं है।


यहां के कई शिल्पकार विदेशों में भी जाकर आए है, अपनी ईस कलाकारी की वजह से और कई कलाकारों को तो राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के सम्मान जैसे ईनाम व प्रमाणपत्र आदि भी मिले हैं । यह गांव है तो छोटा सा गांव पर यहां के लोगों की अपनी इस अनोखी विधा में महारथ के कारण यह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी एक अलग पहचान रखता है । सरकार द्धारा भी ईस ओर काफी प्रयास किये गए हैं ताकि इन मृणशिल्पकारों का जीवन स्तर थोडा उंचा उठे ।


मोलेला गाँव अपने स्वाभिमान के साथ खड़ा है । 


यहा पर पर मिट्टी  से कई नई वस्तु बनाई जाती है ।

 

यहा मुख्य यही रोजगार है ।


मोलेला से सम्बंधित कई प्रश्न एग्जाम मे पुछे जाते है ।

  

जशवन्त सिंह डोडिया ठिकाना-कोटेला

कांकरोली का गुप्तेश्वर महादेव मंदिर 
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राजसमन्द के कांकरोली में राजकीय बालकृष्ण विधाभवन उच्च माध्यमिक विधालय के पास ही स्थित है,  

गुप्तेश्वर महादेव का पवित्र व बहुत प्राचीन मंदिर । यह मंदिर कांकरोली के महत्वपुर्ण शिव मंदिरों में से एक है ।  

यहां के कई स्थानिय आस्थावान लोग, व्यापारीगण एवं महिलाएँ तो रोजाना प्रातः यहां दर्शनों के लिये गुप्तेश्वर महादेव मंदिर आते है् । 

यह राजसमन्द की पाल के दुसरी तरफ बना हुआ है व ईस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यह अतिप्राचीन लगभग 950 वर्ष पुराना मंदिर है। मंदिर में अन्दर जाने हेतु एक संकरी सी लम्बी गुफा में से होकर जाना पडता है, और यह गुफा करीब 65 फीट लम्बी है ।  

अन्त में गोलाकार मंदिर आता है, ईसकी परिक्रमा भी है । दर्शनार्थी जो यहां दर्शन के लिये आते हैं, वे परिक्रमा भी करते है । इस मंदिर में जाने व दर्शन मात्र करने से एक बहुत अलग सा एहसास होता है व मन को काफी शान्ति मिलती है ।


महाशिवरात्री के पावन पर्व पर यहां दर्शनों के लिये सर्वाधिक भीड लगती है । उस दौरान यहां एक बडे मेले का सा माहोल होता है, मंदिर के बाहर ही फूल मालाएं, बिल्व पत्र व आकडे के फुलों की माला वाले, नारियल वाले, रंग बिरंगे गुब्बारे वाले, तरह तरह के खिलोने वाले आदि यकायक जाने कहीं से आ जाते है ।   

मंदिर में भी व्यवस्था बनाए रखने के लिये रेलिंग वगेरह लगाई जाती है, ताकि दर्शन करने वाले एक लाईन मे चलते हुए शिवजी के दर्शन कर पाएं । युं तो मंदिर में भगवान शिव की पुजा, श्रंगार, आरती आदि रोजाना ही की जाती है पर ईस महाशिवरात्री के त्योहार के मौके पर खास श्रंगार किया जाता है व फिर दर्शन होते हैं । 

पुजारी एवं स्वयंसेवी लोगों द्वारा प्रसाद, चरणामृत आदि भी दर्शनार्थीयों को दिया जाता है 


भजन भक्तगण “बम बम भोले” करते रहते है, शिव स्तुति व भजन गाते हैं,  और शिवलिंग के दर्शनों का लुत्फ लेते हैं । कई शौकीन लोग शिवजी का विशेष प्रसाद “भांग” भी लेते हैं व मस्ती में तल्लीन रहते हैं, क्योंकि यह दिन हे ही भोले बाबा एवं उनके भक्तों के नाम । 

महाशिवरात्री के मौके पर तो यहां दर्शन करना बडा भारी काम हो ए॓सा लगता है ।  लाईन में लगना, धीरे धीरे भीड में से होकर मंदिर मे जाना, कहने का अभिप्राय यह हे कि भगवान भी युं ही दर्शन नहीं देते हें, काफी भक्ती करवाते है । वेसे इतनी भीड में जुते चोरी हो जाने का या फिर बटुआ कोई पार ना कर ले, इसका डर बना रहता है। पर यह भोले बाबा के भक्तगणों की अटूट आस्था है, कि वे कम से कम महाशिवरात्री के इस पावन पर्व तो एक बार शिव दर्शन करें ही करें ।



जय शिव भोले

कांकरोली का साक्षी गोपाल मंदिर


कांकरोली में दरवाजे के बाहर ही स्थित है, साक्षी गोपाल मंदिर ।


 यह भी काफी पुराना व प्रसिद्ध भगवान कृष्ण का मंदिर है।


 काफी आस्थावान लोग यहां दर्शन करने आते है । गोपाल यानी कृष्ण भगवान को सजाया संवारा जाता है, 


ततपश्चात आरती, पुजा एवं दर्शन आदि होते हैं । 


यहां के स्थानिय कई लोगों की ईस मंदिर के प्रति बडी आस्था है ।

          गौरम घाट की रेल यात्रा🚉


गौरम घाट राजसमंद जिले का एक अन्य महत्वपुर्ण आकर्षक पर्यटन स्थल है,  यह एक बहुत ही दुर्गम पहाडी ईलाका है और यहां तक जाने के लिये रेल एक मात्र आवागमन का साधन है।  कांकरोली के रेलवे स्टेशन से यहां गौरम घाट जाने हेतू मारवाड जंक्शन की ट्रेन सुबह सवेरे 8.30 या 9.00 AM के लगभग जाती है । ईस ट्रेन का टिकट बहूत ही मामुली रुपयों में मिलता है, पर यह सफर एक अविस्मरणीय याद कि तरह हमारे जेहन में लम्बे समय तक रहता है ।


कांकरोली से यह ट्रेन चलती है फिर भीलवाडा रोड बाइ पास, कुंआथल,  कुंवारिया और ए॓से कई सारे छोटे मोटे गांव शहर रास्ते में आते हैं । अंग्रेजों के जमाने में बने हुए यह चंद रेलवे स्टेशन आज भी जैसे हमें उस जमाने की यादें ताजा कराते प्रतीत होते हैं । कहीं तेज तो कहीं मंथर गति से चलती हूई रेल व रास्ते के बीच आने वाले रेलवे स्टेशन के पुराने भवन, स्टोर रुम काफी आकर्षक लगते है । काफी समय के बाद शुरु होता है घाट सेक्शन, यहां से रेल की गति बहुत धीमी हो जाती है, पहाडी इलाका शुरु होते ही हमें दूर दूर के नजारे दिखने लगते है । बंदर,  नीलगाय, लोमडी व रंगबिरंगी चिडीयांए आदि का दिखना यहां कोई अचरज की बात नहीं है । घने जंगल, पहाडीयों  व सर्पिलाकार रास्तों से जाती हुई ट्रेन दो बडी टनल या गुफाओं से गुजरती है तो बडा अलग सा ही एक नया अनुभव होता है ।


रेल गौरम घाट पर पहुंचती है और चंद मिनटों के लिये रुकती हे,  पर्यटक यहां रुकते है व शाम को यही रेल मारवाड जंक्शन होकर 4 या 4.30 के आसपास वापस गौरम घाट व कामली घाट पहुंचती है । गौरम घाट के रेलवे स्टेशन पर प्रथम चिकित्सा सुविधा व पानी आदि मिल जाता है।  गौरम घाट के रेलवे स्टेशन के आस पास बहुत से बंदर है जो झुंड में रहते है । यह रास्ता ईतना दुर्गम है कि अब तक भी यहां बिजली की सुविधा उपलब्ध नहीं है । रेलवे वाले भी सोलर लाईट्स आदि का उपयोग करते हैं । यहां कुछ चाय, नाश्ता आदि नहीं मिलता है,   अतः बेहतर हे कि यदि पिकनिक के लिये जा रहें हें तो साथ लेकर ही जाएं ।


गौरम घाट पर पर्यटक दूर दूर के प्राकर्तिक नजारे देख सकते हैं । खासकर बारिश के दिनों में यहां कि प्राकर्तिक सुंदरता जेसे और भी खिल उठती हे । गौरम घाट रेलवे स्टेशन के पास से ही एक रास्ता पहाडी पर बने एक मंदिर को जाता हे, उपर जाने के लिये सीढ़ीयां है ततपश्चात पगडंडी है जिससे मंदिर तक पहुंचा जा सकता है । वहां से पहाडों के नजारे बडे ही अच्छे लगते है । एक अन्य साधु महाराज की धुणी भी वहां है, रेलवे ट्रेक से सामने की तरफ बने पगडंडी के रास्ते से वहां तक जाया जा सकता है ।


शाम को यह रेल मारवाड जंक्शन से वापस होकर 4 या 4.30 के आसपास वापस गौरम घाट पहुंचती है, वापस इसी रेल के द्वारा कांकरोली व बाद मे अन्य स्थानों पर पहुंचा जा सकता है ।


जशवन्त सिंह डोडिया ठिकाना-कोटेला

              भारत का गणतंत्र दिवस                

हर वर्ष की भांति इस बार फिर से गणतंत्र दिवस आ गया है, यह दिन हे देशभक्ति के गीत सुनने का, देश की आजादी की लडाई में काम आ चुके शहीदों को याद करने का । यह दिन हे स्कुलों व सरकारी कार्यालयों मे बडे लोगों (जो हाई डोनेशन दे सके) द्वारा झण्डारोहण करवाने का, यह दिन हे मोटी तोदं वाले नेताओं के उबाउ भाषण सुनने का, यह दिन हे पी. टी. , परेड व सांस्कृतिक कार्यक्रमों का, यह दिन है तरह तरह की झाँकिया देखने का, यह दिन हे छोटे छोटे बच्चों की परेड का, यह वही दिन हे जब स्कुलों मे मिठाईयां बांटी जाती है, मुट्ठी भर बुन्दी (या कोई भी मिठाई) जो कोई बच्चा शायद अपने घर पर खाए या नहीं, पर ईस दिन तो बच्चों को वो चंद बुन्दी के दाने भी ईतने स्वादिष्ट लगते हें जेसे दुनिया में ईससे बहतर कोई मिठाई ही ना हो ।

तो आईये, आज 26 जनवरी के दिन हम सब मिल कर फिर से एक बार वन्दे मातरम् गाते हैं, व अपने देश भारत के विकास के प्रति हर रुप से कटिबद्ध होने का स्कल्प लेते है, सिर्फ युं ही उपरी मन से नही अपने अन्तर्मन से व अपनी आत्मा से। हम सब मिल कर आज के दिन कम से कम एक छोटा सा प्रण लेवें कि हम अपने देश की राष्ट्रीय सम्पत्ति को किसी भी प्रकार से नुकसान नहीं पहुंचाएँगें ।

सभी को एक बार फिर से हमारे गणतंत्र दिवस की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ ।

गणतंत्र दिवस व स्वत्रंता दिवस की मुट्ठी भर की मिठाई खाने मे जितना  आनंद आता है उतना ज्यादा खाने मे भी नही आता है । 
क्योंकि यह मिठाई हमारे देश प्रेम 
 से जूडी हुई है ।

जशवन्त सिंह डोडिया ठिकाना-कोटेला

रणमुक्तेश्वर महादेव व प्रताप गुफा

हल्दीघाटी के ही रास्ते में आता है रणमुक्तेश्वर महादेव का मंदिर, यह मंदिर अपना एक अलग एतिहासिक महत्व रखता है, क्योंकि महाराणा प्रताप यहां गुफा में कुछ समय के लिये रुके थे, तब से यह प्रताप गुफा के नाम से भी जाना जाता है । रणमुक्तेश्वर महादेव मंदिर का यह पवित्र मंदिर आज भी जैसे स्वाभिमानी राणा प्रताप की दास्तान बयान करता नजर आता है, धन्य हें वे लाल जिन्होने आजादी कि खातिर अपने सारे एशोआराम छोड दिये ।
महाराणा प्रताप के जीवन का एक बडा समय यहीं मेवाड के पहाडों व गुफाओं में ही बीता । रण या युद्ध से मुक्ति दिलाने वाले रणमुक्तेश्वर महादेव का मंदिर वाकई में काफी अनोखा है । यहां की गुफा में अधिकांशतः पानी बहता रहता है जो पहाडों में से होता हुआ जाने कहां से आता है । यहां रोजाना पुजा अर्चना आदि की जाती हे और विशेष मौके जेसे महाशिवरात्री या महाराणा प्रताप जयंति आदि पर खास दर्शन होते हैं । यहां ठहर कर कुछ पल रुकने मात्र से ही मन को असीम शांति मिलती है ।
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भीम सिंह डोडिया

Dodia rajput sardargarah THAKUR BHIM SINH DODIA > दूसरा सन्धि प्रस्ताव :- दूत :- कुंवर मानसिंह कछवाहा (आमेर) जून, 1573 ...